प्यारा नन्दोई ( पार्ट 2) Lovely Brother-in-law, Part 2

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वापस घर पहुँच कर सुन्दर को जब ये अहसास हुआ कि गैस वाले मामले मे वो जबरदस्त बेवकूफ बन चुका है तो उसे अपने ससुराल वालों पर बहुत क्रोध आया । उसने विमला को खूब खरीखोटी सुनाई । पर विमला ने तो सब कुछ सहते हुए चुप रहने की अच्छी खासी प्रेक्टिस कर रखी थी ।
खैर समय बीता , एक दिन विमला ने सुन्दर को घर पर एक नये नन्हे सदस्य के आगमन की खुशखबरी दी तो सुन्दर ने विमला को फिर से ससुराल छोड़ कर आने की योजना बना डाली । वो विमला को उसके मायके ले गया और बोला कि उन लोग के घर पहली डिलीवरी मायके मे ही होती है , औौर सारा खर्च भी लड़की वाले ही करते हैं । समय से बहुत पहले ही सुन्दर ने विमला को उसके माँ बाप के घर छोड़ कर राहत की सांस ली ।
समय आने पर विमला ने एक नन्ही सी बच्ची को जन्म दिया । वैसे तो इतनी प्यारी सी बच्ची को देख कर सभी बहुत हर्षित हुए पर कन्या ??वो भी सुन्दर जैसे इन्सान के घर ! पता नही वो कैसा व्यवहार करे ।और जिसका डर था वही हुआ । बेटी होने की खबर सुन कर सुन्दर ने बिलकुल ही चुप्पी साध ली । महिनो बीत गये वो बच्ची को देखने नही आया । अब तो विमला के माँ बाप यही समझने लगे कि दामाद ने अपनी पत्नी और बेटी को छोड़ ही दिया है । उन लोग ने इसे अपना दुर्भाग्य समझ चुप लगाना उचित समझा ।
पर चपला बहू दीपा ने अभी हार नही मानी थी , उसने एक योजना बनाई और ससुर जी से कह कर सुन्दर को एक पत्र लिखवाया कि कन्या का नामकरण संस्कार मे पिता का उपस्थिति बहुत जरूरी है अतः आप आ जाइये । सुन्दर जी ससुराल पहुँच गये । कन्या का नाम पूजा रखा गया । हफ्ते भर के बाद जब सुन्दर अकेले ही वापस लौटने की योजना बनाने लगा तो दीपा ने उसके आगे रेल यात्रा के दो रिजर्वेशन टिकट रख दिये । तो सुन्दर जो पहले से ही सोच  कर आया था  ,उसके अनुसार बोला ” देखो जी यहाँ स्कूल बहुत अच्छा है , अगर पूजा यहाँ आप लोग के पास रह कर पढ़ेगी तो अच्छा रहेगा ।” दीपा इस तरह के प्रश्न का उत्तर पहले से तैयार करके बैठी थी , वो तपाक से बोली ” देखिये सुन्दर जी ! यहाँ के स्कूल मे सिर्फ संस्थान मे काम करने वालों के बच्चे ही दाखिला पातें है ” इस पर सुन्दर ने कुटिल राय दी कि राजकिशोर को पूजा का गार्जियन बना दो । अब दीपा ने अपनी सारी बुद्धि लगा कर जवाब दिया ” वो हो सकता है पर दो स्थिति मे , एक तो ये कि पूजा की माँ तलाकशुदा है या फिर उसका पति नही है । दोनो स्थिति मे सरकारी प्रमाणपत्र देना होगा ”
अब तो सुन्दर को कुछ बोलने को नही रहा । उसने चुपचाप पत्नी और बेटी को साथ लिया और ट्रेन पकड़ ली ।अपमान और दुःख से भरी विमला ने आगे क्या किया हम जानेगे अगली बार ।
हल्की

प्यारा नन्दोई ( पार्ट १ ) Lovely Brother-in-law, Part 1

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नवल किशोर जी ने लग लग कर अपने बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा दी । बेटा सफलता पूर्वक इंजीनियर बन कर सरकारी अफसर बन गया । बेटी पोस्ट ग्रेजुएट हो गई । अब पिता के रूप मे उनका अगला फर्ज बनता था, अपने दोनो बच्चों की शादी करना । पढ़ाकू बच्चे  भी पूरी तरह से अपने पिता पर निर्भर थे कि पिताजी उनके लिये एक अच्छा सा जीवन साथी तलाश देंगे । पिता भी खोज मे लग गये । रिश्तेदारों और दोस्तों को बोला , समाचार पत्रों मे विज्ञापन दिया । बेटे राजकिशोर के लिये लड़की तो फटाफट मिल गई । धूमधाम से शादी करके बड़े घर की चपल कन्या को यानी दीपा को घर ले आये । चलो इतना बड़ा काम हुआ । चैन की सांस !
पर बेटी विमला के लिये उपयुक्त वर की तलाश मे अच्छे खासे पापड़ बेलने पड़े । विमला वैसे तो सर्व गुण सम्पन्न ,पढ़ी लिखी लड़की थी पर उसके दो जबरदस्त ‘ माइनस पाइन्ट ‘ थे जो एक अच्छी  अरेन्जड मेरिज के लिये बड़े घातक साबित हो रहे थे । पहला कि विमला देखने मे सुन्दर नही थी दूसरा कि नवल किशोर जी के पास ज्यादा दहेज देने लायक धन नही था । विमला ने पिता की परेशानी समझ कर उनको कहा कि वो शादी नही करेगी , पर पिता नही माने । अन्ततः विमला की शादी एक ऐसे लड़के से कर दी गई जो ज्यादा पढ़ा लिखा ना था और और छोटा – मोटा धन्धा करता था । उ सके चरित्र की बहुत सी विशेषताओं मे मुख्य थी कि वो बहुत लालची , बेशर्म और खड़ूस किस्म का था । ऐसे अलग तरह के व्यक्तित्व के मालिक का नाम था – सुन्दर ।
सुन्दर को विमला बिलकुल पसन्द नही थी । वो उसे तरह तरह से तंग करता था । सहनशील विमला अपनी स्थिति समझती थी अतः चुप रहती थी । घर मे सुन्दर ने कुछ भी सुविधा नही जुटा रखी थी, यहाँ तक की घर मे गैस भी नही थी । विमला को लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाना होता था ।
एक दिन सुन्दर को ख्याल आया कि विमला को अगर पी एच डी करा दी जाय तो काॅलेज मे लेक्चरर बन जायेगी और अच्छी खासी नियमित आय होने लग जायेगी । पर कौन कराये और कहाँ से ? अचानक ख्याल आया कि विमला का भाई इतना बड़ा अफसर लगा हुआ है , वो किस दिन काम आयेगा ? आखिर मै भी तो उस घर का दामाद हूँ ! इस बात का मुझे पूरा फायदा लेना चाहिये ।बस तो फिर सुन्दर विमला को लेकर पहली गाड़ी पकड़ कर अपनी ससुराल पहुँच गया । जैसे ही ससुराल वालों ने ये सुना कि दामाद जी विमला को पी एच डी कराना चाहते हैं , वो भी यहाँ से , तो उनको इसमे सुन्दर की चाल नजर आने लगी । वो ये कि , विमला को ये पीएच डी के बहाने से यहीं छोड़ना चाहता है।
ससुराल वाले तरह तरह के बहाने बनाने लगे । सुन्दर को लगा कि ये तो नही मान रहे हैं तो उसने खाना बनाने वाली गैस की मांग रख दी । ससुराल वाले हैरान कि कहाँ पीएचडी और कहाँ गैस ! बहू दीपा को समझ मे आ गया कि प्यारे नन्दोई को पता नही है कि गैस ऐसे नही मिलती है , कनेक्शन के लिये आवेदन करना होता है । दीपा ने इस अज्ञान का फायदा लेकर तुरन्त घर का गैस स्टोव पैक करके दे दिया । सुन्दर उसी दिन शाम की गाड़ी से गैस स्टोव और विमला को लेकर खुशी खुशी अपने घर वापस चला गया । ससुराल वालों ने चैन की सांस ली ।
अब आगे क्या हुआ ! जानेगे अगली बार ।
हल्की

 दोस्ती और दुश्मनी Friends and foes

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नवल कुमार और हरजीत मे इतनी पक्की पक्की दोस्ती थी कि लोग उनकी दोस्ती की मिसाल देते थे । नवल और हरजीत तो बचपन के मित्र थे ही पर उनके बीबी बच्चे भी आपस मे मित्रता निभा रहे थे । इन दोनो ने अपनी दोस्ती को एक नया रंग दे डाला था , यानी स्वयं अपने अलग से नाम रखे थे । वे एक दूसरे को प्यारा और न्यारा के नाम से पुकारते थे । हरजीत न्यारा और नवल प्यारा बने हुए थे ।
मजे मे दिन बीत रहे थे , परिवार वाले भी खुश । ऐसे ही एक खुश नुमा शाम को न्यारा की छत पर यारों की महफिल जमी थी । किसी बात को लेकर गर्मागर्म बहस छिड़ी हुई थी । किसी एक विषय पर प्यारा और न्यारा मे थोड़ा मतभेद हुआ , फिर दोनो एक दूसरे को गलत ठहराने लगे , उसके बाद दोनो एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लगे , गाली गलौज होने लगी और फिर हाथापाई शुरू हो गई । मित्रों ने उन दोनो को अलग किया । न्यारा और प्यारा दोनो को अपने जिगरी दोस्त से ये उमीद नही थी । दोनो ही एक जैसी गुस्से और अपमान की तकलीफ झेलने लगे ।
न्यारा और प्यारा ने अपने परिवार वालों को दोस्त ( जो अब दुश्मन बन गया था ) के परिवार से अलग हो जाने की हिदायत दे डाली । सबसे पहले एक दूसरे के घर का सामान लौटाया गया जो कभी उधार मांगा गया था जैसे दाल सब्जी की कटोरियाँ , स्वेटर बुनने की सलाइयां , किताबें , साइकिल मे हवा भरने वाला पम्प  आदि । उसके बाद घर की महिलांओ की बातचीत बन्द हुई फिर बच्चों ने भी साथ खेलना बन्द कर दिया । जिस रास्ते से न्यारा जाये ,,प्यारा उस रास्ते को छोड़ दूसरे रास्ते को पकड़ ले । दोनो ने एक दूसरे के साथ बिलकुल अनजानो की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया । पहले तो दोनो को ऐसा करना बड़ा ही अजीब और तकलीफ देह लगा पर धीरे धीरे दोनो को ही इसकी आदत पड़ गई ।
समय तो मन्थर गति से बीतता चलता है और बीता वक्त कभी वापस नही आता । न्यारा और प्यारा को इस तरह अलग हुए लगभग पाँच साल होने को आए । एक दिन बाजार मे न्यारा जी घड़ीसाज से अपनी घड़ी सुधरवा रहे थे और बगल मे ही प्यारा जी मोची से जूता सुधरवाते खड़े थे । पहले तो न्यारा  ने प्यारा को वहाँ देख बुरा सा मुहँ बना लिया , फिर वो पाँच साल पहले के झगड़े को याद करने की कोशिश करने लगा । पर लाख कोशिशों के बाद भी उसे याद ना आया कि लड़ाई किस वजह से हुई थी । उसने प्यारा को चोर निगाह से देखा तो उसे भी अपनी ओर ही देखते पाया । न्यारा से रहा ना गया और बोल पड़ा ” ओए प्यारे तुझे याद है क्या , कि अपनी बोलचाल किस वजह से बन्द हुई थी ? ”
प्यारा तो जैसे इन्तजार ही कर रहा था कि न्यारा कुछ बोले ,वो झट बोल पड़ा ” ना ना मुझे तो जरा भी याद नही ”
अब भरी भरी सी आवाज मे न्यारा बोला ” तो हम किस बात की दुश्मनी निभा रहे हैं ?”
अब तो    दोनो दौड़ कर एक दूसरे के गले लग गए और आँसू बहाने लगे । खुशी और पश्ताचाप दोनो एक साथ ।
खुशी तो समझ मे आती है पर पश्ताचाप क्यों ? अपने बहुमूल्य जीवन के पूरे पाँच साल दुश्मनी , घृणा , गुस्से की भेंट चढ़ा देने के कारण ।
हल्की

सोच मे भी…. – Thrifty thoughts….

DrawingPadApp (12) मेरी दोस्त अलका थोड़ा सोच समझ कर खरचा करती है ,इतना तो हम सभी को पता था । पर ये तभी तक पता था जब तक हमारी दोस्ती हल्की फुलकी ही थी । जैसे ही दोस्ती प्रगाढ़ हो चली तो उसका कंजूसी वाला रवैया खुल कर सामने आने लगा । अब हम इस मामले मे क्या क्या लिखें – हो सकता है कि पाठकों को मेरे लिखे पर विश्वास ही ना हो , पर आपको विश्वास करना ही होगा क्योंकि मैने तो जीवन के ‘ खट्टेमीठे सच ‘ को आप तक पहुँ चाने का वादा जो किया है ।
अलका जी बेलन से सिर्फ रोटी ही नही बेलती थी , वे टूथपेस्ट की ट्यूब पर रोल कर कर के उसके अन्दर का सारा पेस्ट निकाल कर ही दम लेती थी । रात को जब सोने जाती थीं तो फ्रिज भी बन्द कर देती थी । कहना था कि छ: सात घन्टे की ही तो बात है , उतनी देर फ्रिज अपनी ठन्डक से अन्दर रखी चीजों को ताजा रखेगा , तो बिजली क्यों ‘ वेस्ट ‘ करना ।
हमारी दोस्त अलका के इकलौते बेटे का जन्मदिन पड़ा । बेटा मचल गया कि मै अपने सारे दोस्तों को पार्टी दूँगा । माँ ने बहुत समझाया कि पार्टी का खरचा बचा के वे लोग उसके लिये कुछ अच्छा खरीद देंगे ,पर बेटा नही माना ।
अलका मेरे घर आई बोली ” मेरे को जरा पार्टी का मेनू बनवा दो , इस बात का ख्याल रखना कि खाना बच्चों को पसन्द भी आये और मेरा खरचा भी ज्यादा ना हो ।  ”
बहुत ध्यान और ‘ केलकुलेशन ‘ के बाद मेनू तैयार हो गया । अब स्कूली बच्चों को ‘ बिजी’ रखने के लिये कुछ गेम्स भी करवाने थे । मैने एक ‘ माइन्ड पजल गेम’ के लिये कहा और उसकी रूपरेखा बताते हुए कहा कि गेम ऐसा होगा , और हर सही जवाब पर हम लोग खिलाड़ी को दस दस नम्बर देते जायेंगे ।
” दस दस नम्बर क्यों ? दस नम्बर ज्यादा हैं , हर सही जवाब पर सिर्फ ंएक नम्बर दो ” अलका ने मुझे तुरन्त रोका ।
यह दलील सुनकर मेरा हैरान मन ईश्वर का बार बार धन्वाद करने लगा कि उसने अलका को टीचर नही बनाया  , ये तो अलग बात है कि अलका को यह अन्दाजा नही था कि यहाँ दस और एक नम्बर की ‘ वेल्यू ‘ एक ही है पर फिर भी …………. अब आगे आप सोचिये ।
हल्की

सोच अपनी अपनी – Different Views

DrawingPadApp (11)  पड़ोस मे रहने वाली भानूमती जी बेहद धार्मिक महिला थीं। उनका सारा समय पूजा पाठ मे ही बीतता था । सुबह की पूजा सवेरे जो शुरू होती थी तो जाकर दिन के दस बजे तक चलती थी । शाम को फिर से पूजा मे बैठ जाया करती थी । मुहल्ले मे उनकी बहुत इज्जत थी । उनकी और हमारी कामवाली एक ही थी । उसका नाम पारो था ।
पता नही क्या संयोग था कि भानुमती जी को अपने घर मे चोट पर चोट लगती रहती थी । कभी पैर की हड्डी टूट गई , कभी हाथ दरवाजे के बीच दब के चोट लग गई । अभी एक नयी चोट लगी थी ,वो ये कि भानू के ऊपर बहुत गरम चाय गिर गई और उन्हे हास्पिटल जाना पड़ा ।
मै इस विषय पर पारो से बात कर रही थी , कि क्यों आखिर भानूमतीजी को बार बार चोट लग जाया करती है । तो पारो मुँह बना के बोली ” ये मेडम सारा समय पूजा कर कर के भगवान को बहुत तंग करती है । भगवान को तो पूरी दुनिया को देखना होता है। और ये मेडम भगवान को बार बार डिस्ट्रब  करके  भगवान को गुस्सा कर देती है । ये सब भगवान का गुस्सा ही है ”  मुझे पारो की इस सोच पर हंसी आने लगी तभी उसने और आगे अपनी बात बढ़ाई ” अब हमको ही देखो – सारा दिन काम ही काम अगर आज काम ना करो तो कल रोटी नही मिलेगी । ये  भानू मेडम सुबह नाश्ता नही बनाती साहब और बेटी बाजार की ब्रेड और जेम खाकर आफिस और स्कूल जातें हैं । मेडम घर कितना गन्दा रखती है । साहब शाम को थक के लौटते हैं तो बाजार करने जाते हैं । अगर मेडम कीर्तन मे चली गई तो साहब को ही रात का डिनर भी बनाना होता है ”
” क्या तुम बिलकुल पूजा नही करती ? ” मैने कौतुहल वश पारो से धर्म और अध्यात्म पर उसकी सोच को जानना चाहा ।पारो तपाक से बोल उठी  ” अरे मै भानू मेडम की तरह पूजा करने बैठ जाऊँ तो हमारा तो भगवान भी मालिक नही बनेगा । मै जब खाना खाने बैठती हूँ तो पहले कौर के साथ भगवान को याद करती हूँ , क्योंकि खाना देने वाला वही है । रात को सोने से पहले एक बार भगवान को याद कर लेती हूँ , क्योंकि उस दिन की जिन्दगी उसी ने दी है ”
मै पारो की सोच के आगे नतमस्तक हुए बिना नही रही । कर्महीन भक्ति और भक्तिहीन कर्म के बीच भेद इससे अच्छा और कौन मुझे बता सकेगा ।
हल्की

भूरी – Brown Goat

भूरी
भूरी

कमला बाई हमारे मुहल्ल्े मे ही रहती थी । कमला ने बड़े प्यार से एक बकरी पाली थी । बकरी का रंग भूरी था ।  अतः कमला ने उसका नाम भूरी रख दिया था । ये भूरी कोई साधारण बकरी नही थी  ,वो अपने साथ कई विशेषतायें लिये हुए थी ।
भूरी को अकेले ही घास चरने जाना पसन्द था । नियत समय पर भूरी घर वापस भी लौट आती थी । वापसी मे अगर घर का फाटक बन्द हो तो भूरे वहाँ खड़े रह कर में में करने की बजाय अपने अगले पैरौं और मुँह की सहायता से फाटक को खोल लेती थी ।
उसको मुहल्ले के लोग कुछ खाने को देते तो वो कुछ खाना तो बड़े प्यार से खा लेती पर कुछ को बिलकुल अस्वीकार कर देती । कुछ ध्यान से देखने पर पता  चला कि भूरी को जूठा खाना बिलकुल पसन्द नही था । उदाहरण के तौर पर अगर हम लोग खरबूजा या तरबूजा जैसे फल की फाँके अपने  मुँह से काट काट कर खाकर उसके छिलके भूरी को खाने को दें तो वो नही खाती थी । पर अगर उसी फल के छिलके को चाकू से अलग करके भूरी को खाने को दें तो वो बड़े शौक से खालेगी ।
एक दिन कमला ने भूरी  के साथ एक प्रयोग कर डाला , वो ये कि उसने भूरी को एक बरतन मे पीने को पानी दिया तो उसमे थोड़ा जूठा पानी भी मिला दिया । घोर अचरज की बात ! बहुत प्यासी होने के बाद भी भूरी ने उस पानी से अपना मुँह फेर लिया । और जब कमला एकदम शुद्ध पानी लाई तो भूरी जल्दी जल्दी पानी पीने लगी ।
अपनी हिरनी जैसी सुन्दर आँखों से जब वो हम लोग की ओर देखती थी तो ऐसा लगता था मानो कह रही हो कि ” मै बोल नही सकती पर तुम लोग के मनोभावों को जान जरूर सकती हूँ ।”
हम लोग आपस मे बात करते थे कि हम इन्सानो को अगर कोई हमारी जानकारी के बगैर जूठा खाने को दे या पीने को दे तो हम कभी ये नही पता कर सकते कि ये खाने- पीने की चीज जूठी है । इसके विपरीत भूरी मे ये योग्यता थी ।  ये वाकई खोज या अध्ययन का विषय है , कि किसी भी जीव की क्षमताओं का विकास और विस्तार कहाँ तक हो सकता है ।
एक दिन एक आदमी मुहल्ले मे आया वो कमला से भूरी का सौदा करना चाहता था , पर कमला ने बिलकुल मना कर दिया । और दो दिन बाद ही भूरी चोरी हो गई । हम सभी बहुत दुखी हुए । कमला बहुुत रोई पर साथ ही बोली कि उसे इस बात की तसल्ली है कि उसने इतना लालच दिये जाने के बाद भी भूरी का सौदा नही किया ।
हल्की

गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ Teacher and Student

गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ
गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ

“अरे तुम ! ” शायद मुझे ही किसी ने कहा था । सब्जी के ठेले पर बैगन छांटते मेरे हाथ रुक गये । मैने अपने सामने खड़ी महिला को देखा जो मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा रही थी । मैने भी उसे पहचानने मे देर नही की । वो मेरे स्कूल समय की दोस्त थी । हम लगभग बीस साल बाद मिल रहे थे । वो मालती थी ,हाँ वो मालती ही थी । विगत बीस सालों मे भी मुझे मेरी इस सहेली की याद एकदम ही ताजा थी । कारण कुछ ऐसा था –

कक्षा नौ मे एक नयी लड़की हमारे साथ पढ़ने आई । उसका नाम मालती था । आठवीं उसने गाँव से पास की थी , पर गाँव मे सिर्फ आठ कक्षा तक का ही स्कूल था । मालती अपने किसी रिश्तेदार के पास रह के पढ़ाई करने आ गई थी । मालती मेरी अच्छी दोस्त बन गई ।

मेडम सरला हमे इंगलिश पढ़ाती थी । वो स्कूल की वाइस प्रिंसिपल भी थी । उनका बहुत दबदबा था । सब लोग उनसे बहुत डरते थे । मेडम सरला अपने नाम के विपरीत बहुत ही कठोर स्वभाव की थी । पता नही क्यों वे मालती को पसन्द नही करती थी । असल मे उनके बार बार टोकने के बाद भी मालती श को स उच्चारित करती थी ,और वे बहुत गुस्सा हो जाया करती थीं ।

एक दिन बस हद ही हो गई , मेडम सरला ने मालती को कुछ बोर्ड पर लिखा पढ़ने को कहा ,जो कि मालती ने गलत पढ़ा । मेडम सरला का पारा सांतवे आसमान पर पहुँच गया । वे मालती की जोर जोर से पिटाई करने लगी । बार बार वे मालती को पढ़ने को बोलती ,वो घबरा कर गलत पढ़ती ,और मेडम उसे बेदर्दी से पीटती चली गईं । हम सभी छात्रायें सहमे बैठे रहे । मालती रोती रही ।

उस दिन की घटना के बाद मालती हफ्ते भर तक स्कूल नही आई , पर जब आई तो चश्मा लगा कर आई । जब उसके घर वालों को इस बात का पता चला तो उन लोग ने मालती का ‘ आई टेस्ट ‘ करवाया उसकी नजर कमजोर थी अतः चश्मा लग गया ।

– आज वही मालती मेरे सामने थी । उसने मुझे बताया कि वो गाँव मे एक स्कूल चलाती है । स्कूल मे बच्चों को मारना बिलकुल वर्जित है । डांटने की जगह टीचर लोग बच्चों को समझाने का काम करते है । और स्कूल बहुत सफल है ।

जाते जाते मालती मुझे यह भी बता गई कि – वे लोग साल मे दो बार सभी बच्चों का हर तरह का शारीरिक परीक्षण यानी मेडिकल चेक- अप  जरूर करवातें है ।

गलत तरीके से ही सही – पर मालती ने मेडम सरला की वजह से अपनी संवेदनशीलता को बढ़ा कर जीवन को एक सुन्दर रूप दे दिया । इसलिये हम अब भी यह कह सकतें हैं कि –

गुरू कुमहार शिष्य कुम्भ है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट ।
अन्तर  हाथ  सहार  दे बाहर   बाहर     चोट   ।।
हल्की