उलझी ऊन सुलझी बुनाई


उलझी ऊन सुलझी बुनाई
  मिसेज तेजवती के जैसा स्वेटर की बुनाई करने वाला तो मुझे आजतक नही दिखा । वे बुनाई भी करती जातीं और बात भी करती जातीं । वे स्वेटर बुनाई के साथ साथ मेगजीन वगैरह भी पढ़लेती थी । बुनाई की स्पीड तो इतनी तेज थी कि अभी देखो तो सलाई पर फन्दे डाल रही हैं और अभी देखो तो बार्डर तैयार , अगले दिन पल्ला तैयार , अगले हफ्ते ही इलाके का कोई ना कोई बच्चा वो स्वेटर पहिने खेलता नजर आ जाता था । इस तरह तेजवती जी सीजन मे काफी कमाई कर लेती थी । हालाकि उनकी बुनाई लोगो को बहुत महंगी पड़ती थी फिर भी जबरदस्त ‘ क्वालिटी ‘ के कारण लोग उनसे स्वेटर बनवाना पसन्द करते थे ।

      गरमी की छुट्टियों मे तेजवती जी अपने बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाती थी । उनका मायका जिस शहर मे था वहाँ ऊन बनाने की फेक्टरियाँ लगी हुई थी । तेजवती वहाँ से सस्ते मे ऊन की लच्छियाँ खरीद कर ले आती थी । फिर उन लच्छियों के गोले बना कर रख लेती थी । लोंगो की डिमांड के अनुसार स्वेटर बना कर बेच देती थी, और काफी पैसे कमा लेती थी । इस बार उनका दोहरा फायदा हुआ । फेक्टरी वाले ने ढ़ेर सारी उलझी हुई रंग बिरंगी ऊन उनको मुफ्त मे दे दी । तेजवती सारी ऊन खुशी से ले आई ।

        तेजवती ने पहले तो उलझी ऊन को सुलझा कर गोले बनाने की कोशिश की पर बार बार ऊन तोड़ कर फिर से जोड़नी पड़ रही थी । थक हार कर उन्होने गोले बनाने का इरादा ही छोड़ दिया । अचानक उनको एक आइडिया आया और उन्होने ऊन का एक लम्बा सा धागा खीचा और बुनाई शुरु कर दी । और इसी तरह धागे खीचा तोड़ कर बुन दिया फिर से नया धागा खीचा ,तोड़ा और बुना ।

     जब वे इस तरह की बुनाई कर रही थी तो बड़ा मजेदार दृश्य दिख रहा था । एक ओर ऊन का बेहद उलझा हुआ फालतू सा ढ़ेर और उसी से तैयार होता रंग बिरंगा स्वेटर ! मैने उनसे ऊन के गोले ना बना पाने का कारण पूछा तो बोली कि ” ऊन इतनी ज्यादा उलझी है कि सुलझाने बैठे तो वही करते रह जायेगें और स्वेटर बनाने का जरूरी काम पीछे छूट जायेगा । या हो सकता है कि ना ही ऊन सुलझे ना ही गोले बने और ना ही स्वेटर ! तो हमने सोचा कि मुख्य काम तो स्वेटर बनाना है वही करना चाहिये । ”

      मैने उनकी समझदार समझ की दाद दी तो वे मुस्कुराते हुए बोली ” इसी तरह हमारी जिन्दगी भी इस उलझे हुए ऊन की तरह है अगर हम हर चीज को सुलझाने मे ही लगे रहे तो सब कुछ तो सुलझने से रहा और हमारा बेहद कीमती वक्त भी निकल जायेगा । अतः हमे चाहिये अपने स्वयं मे परिवर्तन लाकर खुद की जिन्दगी को इस बनते हुए स्वेटर की तरह बनायें । खूबसूरत जिन्दगीनुमा स्वेटर मे गुंथती ‘ ऊन ‘ अपने आप सुन्दर रूप ले लेगी ।”

       हल्की

लुटेरा बंदर


लुटेरा बंदर

अपना नया नया रंगीन चश्मा यानी सनग्लास लगा कर पम्मी ने आदमकद शीशे के आगे अपने को निहारा तो वह अपने को निहारते ही रह गई , पूरा व्यक्तित्व ही बदला नजर आया , काले चश्मे को पहनने से उसके चेहरे की चमक और गोरापन दोनो और बढ़े से लग रहे थे । यह देख कर पम्मी का दिल बल्लियों उछलने लगा । अब इतनी ज्यादा खुशी के और भी कई कारण थे । जबसे पम्मी ने अपनी पसंदीदा हिरोइन को एक फोटो मे ऐसा ही चश्मा लगाए देखा था तभी से उसने वैसा ही चश्मा खरीद लेने की मन मे ठान ली थी पर ये ‘ ब्रान्डेड चश्मा ‘ बहुत ही अधिक महंगा था , और एकदम से इसे खरीद लेना पम्मी के बस की बात नही थी । “अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात ही उसे तुमसे मिलाने मे जुट जाती है ” बस तो फिर पम्मी रोज उस चश्मे का फोटो देख कर रोज ही ‘ ओम् शान्ति ओम् ‘ के इस डायलॉग को मन ही मन दोहराने लगी । साथ ही उसने कुछ महिने तक बचत की और जिस महिने किटी पार्टी मे उसे किटी के पैसे मिले तो दोनो को मिलाकर तुरन्त ही वो ब्रान्डेड ग्लासेज ले ने शो रूम चल पड़ी । चश्मा आ गया ! अपार खुशी ! पर एक बात जो बहुत महत्वपूर्ण थी कि , सभी सहेलियों के बीच इसका प्रदर्शन ! उसके लिए तो अगली किटी पार्टी मे जाना जरूरी था , पर इस पार्टी के लिए पूरे एक माह इन्तजार करना था , यानी कुछ धीरज रखना जरूरी था ।

 इसी बीच पम्मी के यहाँ कुछ रिश्तेदार आए और उन सबका वृन्दावन जाने का बन गया । वृन्दावन पम्मी के घर से ,चालीस किलोमीटर की दूरी पर था । टेक्सी से जाना तय हुआ । पम्मी खुशी खुशी नया चश्मा लगा कर उन लोग के साथ टेक्सी मे सवार होकर चल पड़ी । टेक्सी जब वृन्दावन मे मन्दिर परिसर के आगे रूकी । वहीं आगे दीवार पर बड़े बड़े अक्षरों मे लिखा था – चेतावनी : कृपया अपना मोबाइल ,पर्स चश्मा आदि बंदरों से बचा कर रखें – धन्यवाद । पम्मी इस चेतावनी पर ध्यान नही दे पाई क्योंकि पम्मी का मोबाइल बजने लगा , वो टेक्सी से उतर कर बड़े स्टाइल से मोबाइल पर बात करने लगी । तभी अचानक एक बन्दर बड़ी ही कुशलता से पम्मी का प्यारा चश्मा ले उड़ा ! मोबाइल पर बात करना छोड़ पम्मी बंदर के पीछे भागी । लेकिन तब तक बंदर सामने की ऊँची दीवार पर चढ़ गया । पम्मी आँखों मे आँसू भर कर बंदर से अपना चश्मा वापस करने की विनती करने लगी । पर बंदर तो काला चश्मा लगा कर अपनी दुनिया रंगीन करने मे लगा हुआ था ।

  तभी पता नही कहाँ से एक फ्रूटी बेचने वाला घटनास्थल पर प्रकट हो गया और कहने लगा ” बंदर को फ्रूटी पसन्द होती है आप उसे फ्रूटी दिखाओ , तो वो चश्मा वापस कर देगा ” बंदर का चश्मा लूटना और तुरन्त ही फ्रूटी बेचने वाले का आना -दोनो की ‘ टाइमिंग ‘ मे इतना सामजस्य था कि किसी को भी शक हो सकता था कि बंदर और फ्रूटी बेचने वाले मे कोई ‘ बिजनेस डील ‘ अवश्य हुई होगी । खैर पम्मी के हैरान परेशान पति हरकत मे आए और एक नही दो दो ( दो इसलिए कि तब तक बंदर का बच्चा भी आ गया था ) फ्रूटी खरीद कर दीवार के पास जाकर ” आ आ ये ले ले वो दे दे ” बोल बोल कर बंदर को ‘ एक्सचेंज अॉफर ‘ का लालच देने लगे । पर बंदर कहाँ मानने वाला ? पहले उसने चश्मा खुद पहना फिर बच्चे को पहनाया । बच्चे को चश्मा बहुत ढीला लगा उसने सिर हिला कर चश्मे को नकार दिया । तो बंदर ने चश्मा दो तीन टुकड़ों मे तोड़ कर दीवार के दूसरी ओर फेंक दिया । इधर किसी दूसरे बंदर ने झपट्टा मार कर पति महाशय के हाथ से फ्रूटी भी छीन ली । अपने प्यारे चश्मे का ये दुर्गति होते देख पम्मी के मुँह से एक चीख निकल गई । तभी उन लोग का ध्यान दीवार पर लिखी ‘ चेतावनी ‘ पर गया । उसे पढ़ कर क्रोध मे भरकर पम्मी लगभग चिल्लाने लगी ” अरे इस चेतावनी मे मोबाइल भी लिखा था । अरे नासपीटे हरामखोर बंदर ! ले जाना था तो मेरा मोबाइल ले जाता । मोबाइल वैसे भी पुराना हो गया था । तू मेरा चश्मा ले गया और उसे भी मेरे आगे तोड़ कर फेंक दिया । तेरा कभी भला नही होगा ! हाय अब मै किटी पार्टी मे सहेलियों को क्या दिखाउँगी ! हाय मेरा इतना मंहगा चश्मा ! उफ् !

डारविन का सिद्धान्त

                 मै जब भी कमरे की खिड़की का परदा सरकाती तो घर के पीछे एक छोटे से , सूखे से रेतीले टीले पर लगे पीपल के पेड़ को जरूर निहारती । इस पीपल के पेड़ मे कुछ तो बात अवश्य थी , आसपास की और वनस्पति के मुकाबले यह पेड़ कुछ अलग ही छटा लिये हुए था । अपनी घनी और चमकदार हरी पत्तियों से आच्छादित यह वृक्ष बरबस ही मुझे मोह लेता था । संध्या के समय जब अनेक पक्षी अपने रैन-बसेरे के लिए वृक्ष की शाखाओं पर शरण लेने आते तो वह दृश्य भी देखने लायक होता ।

    यहीं पास मे ही बंगले का आउट हाउस भी था , जिसमे एक पंक्ति मे चार घरों मे चार परिवार रहते थे । सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि एक दिन उनके नल मे पानी आना बन्द हो गया ! प्लम्बर आया , उसको कुछ समझ नही आया । वाटर सप्लाई विभाग के अन्य लोग भी बुलाये गए पर कोई भी इस बन्द लाइन फिर से चालू ना कर सका । अब क्या हो ? पानी तो मनुष्य जीवन की आक्सीजन जितनी ही बड़ी आवश्यकता है । सभी लोगों ने हमारे घर के बगीचे वाले नल से पानी भरना शुरू कर दिया । उन लोगों को तो परेशानी हो रही थी पर साथ ही हम लोग की परेशानी भी कम नही थी । पानी की सप्लाई सुबह शाम सिर्फ एक एक घन्टा ही होती थी । बगीचे का नल लगातार खुला रहने के कारण हमारे घर मे पानी का प्रेशर कम से कम हो रहा था , जिसके कारण ओवरहेड टैंक मे पानी नही भर पाता था । पर हम यही सोच कर रह जाते थे कि हमारी परेशानी फिर भी कुछ कम ही थी ।

      कुछ महिने ऐसे ही चला , क्योंकि इसके अलावा और कोई चारा ही न था । पर एक दिन यह जान कर घोर आश्चर्य हुआ कि सामने वाले बड़े बंगले के बड़े साहब के आउट हाउस मे भी पानी आना बन्द हो गया ! उस बंगले मे वरमा जी का परिवार रहता था । बड़े साहब वरमा जी की पत्नी अपने आप मे निराली थी -रोबीले थानेदार और हायर सेकेन्डरी स्कूल की खड़ूस प्रधानाध्यापिका का मिलाजुला रूप थी । क्या वरमा जी , क्या उनके मातहत , क्या भृत्यवर्ग सभी उनसे डरते थे । उनके पढ़ाई मे अव्वल आते बच्चे -” जी ममा ! अच्छा ममा ! हांजी ममा ! के अलावा मुँह से और कोई ध्वनी नही निकालते थे ।

   अपने बेडरूम मे लगी बेल का बटन जब एक बार मिसेज वरमा दबाती थी थीं तो आउट हाउस मे ये सिग्नल जाता था कि खानसामा को बंगले मे हाजिर होना है , दो बार की बेल – माली दौड़ो , तीन बार – बरतनवाली , चार बार – सफाई वाली , पाँच बार – माली फिर से दौड़ो क्योंकि कुत्ता घुमाना है । लगातार बेल बजी जा रही – सारे एक साथ दौड़ो क्योंकि साहब की कार को धक्का देना है ।

     बेल सुन कर बंगले की ओर दौड़ लगाने वाले ये सभी लोगों ने अब वरमाजी के बगीचे से पानी लेना शुरू कर दिया । परिणाम स्वरूप मिसेज वरमा का बाथरूम का शावर मे पानी आना बन्द ! इस कारण से उनका गुस्सा सांतवे आसमान पर । ( कभी कभी इन कड़क स्वभाव वाले लोगों से एकदम सही काम भी हो जातें है ) यहाँ फोन – वहाँ फोन , इसको डांट उसको डांट । तुरन्त ही दस पन्द्ह लोगो का दल अपने सुपरवाइजर के साथ हाजिर हो गया । पानी ना आने का कारण पता लगाने के लिए उन लोग ने पाइप लाइन वाली जगहों की खुदाई करनी शुरू कर दी । खुदाई करते करते वे लोग टीले तक चले गए और वहाँ घोर आश्चर्य भरा कारण नजर आया !! वो ये कि पाइप लाइन मे पीपल की जड़े प्रवेश कर गई थीं और लाइन ब्लाक हो गई थी । सबसे मजेदार बात तो ये थी कि जिस पाइप की चूड़ी खोलने के लिए श्रमिकों को अपने औजारों की सहायता से इतना जोर लगाना पड़ रहा था , वहीं कोमल कोमल जड़ों का समूह चूड़ियों के रास्ते आराम से प्रवेश करके अपने पेड़ की वाटर-सप्लाई मे लगा हुआ था ।

    मुझे उस लुभावने पीपल की खूबसूरती का राज समझ मे आ गया । डारविन के सिद्धान्त के अनुसार हर जीव मे जीवन के प्रति एक जिजीविषा ( survival instinct) होती है इसके लिए वो संघर्ष करता है (struggle for the life ) और अन्त मे ताकतवर विजयी होता है ( survival of the fittest ) और हमारा चहेता वो टीले वाला पीपल का पेड़ भी इसका अपवाद ना था क्योंकि जब उसको अपनी जमीन मे जल ना मिला तो उसने हमारी पाइप लाइन मे सेन्ध मार कर अपने को बचाए और बनाए रखते हुए डारविन के सिद्धान्त का ही पालन किया ।

ट्रबलशूटर ( The Trouble Shooter )

                          बात उन दिनो की है जब हम लोग मध्य भारत के एक हरे भरे शहर मे रहते थे । पति एक सरकारी संस्थान मे काम करते थे और हम लोग सरकारी बंगले मे रहते थे । ये बंगला करीब सौ साल पुराना था । अकेला बना बंगला पीपल , नीम , आम के ऊँचे ऊँचे पेड़ों से घिरा था । कमरों की दीवारें बेहद ऊँची और मोटी थी , छत खपरैल की थी और अन्दर ‘फाल्स सीलिंग ‘ थी । कमरे इतने बड़े कि बीस पच्चीस लोग आराम से बैठ कर पिक्चर देखने का आन्नद ले लें ।पहले तो ऐसे घर मे रहना बड़ा अजीब सा लगता था पर धीरे धीरे आदत हो गई ।

   एक शाम की बात है , बच्चे बाहर लॉन मे आसपास के अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे कि अचानक उन लोग ने घर की छत पर एक लम्बा सा सांप मटरगश्ती करते देखा । बच्चों ने चिल्ला कर मुझे बुला कर दिखाया , मेरे देखते देखते सांप जी छत की खपरैलों के बीच गायब हो गये ! अब इसके तुरन्त बाद ही मेरा मानसिक तनाव हदें पार करने लगा क्योंकि एक तो पति महाशय एक महिने के लम्बे कोर्स पर दूसरे शहर गए हुए थे , दूसरा रंग देख कर लग गया था कि सांप खासा जहरीली प्रजाति का था , तीसरे पुराना घर होने के कारण सीलिंग जगह जगह से टूटी हुई थी , यानी सांप महोदय किसी समय भी अन्दर कमरे मे पदापर्ण कर सकते थे , ये उनकी इच्छा पर निर्भर करता था ।

    अब क्या करें ? रात को तो कुछ हो नही सकता था । बच्चे बहुत छोटे थे , वे तो सो गए पर मैने पूरी रात जाग कर गुजारी , घर की सारी बत्तियाँ जला कर रखी । सुबह फायर ब्रिगेड वालों को मदद के लिये बुलाया । उन लोग ने जो उपाय बताया वो मेरे लिये मुश्किल ही नही नामुमकिन ही था , वो ऐसे कि वे लोग सांप ढूंढने के लिये घर की सारी छत तोड़ने जा रहे थे । मैने उनसे पूछा कि सांप विदा करने के बाद क्या वे लोग तुरन्त छत वापस मरम्मत कर बना देंगे ? तो उन लोग ने इन्कार कर दिया ।

  अब क्या करें ? बरसात का मौसम शुरू हो चुका था , टूटी छत के साथ तो गुजारा नही था , वो भी छोटे बच्चों के साथ ।तभी एक शुभचिंतक एक तान्त्रिक महाशय को बुला लाया जो सांपों पर अच्छा खासा कंट्रोल रख लेते थे ।सिर पर एकदम सफेद बाल , सफेद दाढ़ी , सफेद कुरता पायजामा और सफेद जूते , उनका व्यक्तित्व देख पूरा विश्वास हो गया कि ये जरूर छूमंतर से सांप को वश मे करके कहीं और भाग जाने का आदेश दे देगे । उन्होने तुरन्त ही अपने झकझक सफेद कुरते की जेब से कुछ चने निकाल कर घर की दीवार के पास जमीन मे गाड़ दिये और कहा -” बेटी अब सांप यहाँ नही रह सकता , अब तुम्हारे घर के आसपास भी इस प्रकार के जीव नही आयेंगे । मैने पूरे घर को बांध दिया है ” वे तुरन्त मुड़े और वापस चल दिये । हमने नतमस्तक होकर राहत की सांस ली । पर शाम को फिर से छत के एक कोने से लटकी हल्की सी पूँछ ने तान्त्रिक महाशय के चनों को अँगूठा दिखा दिया । दूसरी रात भी मैने जाग कर काटी ।

     अगली सुबह मैने सोच लिया कि अब छत तुड़वाने के अलावा और कोई चारा नही । तभी गेट पर बकरी चराने वाली बाई अपनी बकरियों के साथ आ कर बैठ गई । हमेशा की तरह मैने उसको चाय दी और अपने लटके मुँह का कारण बताया । उसने तुरन्त कहा -” अरे बिटिया एमा इत्ता परेसान होने की का बात है ? कमरा मे धुआँ करो , सांप तुरन्ते भाग जाब । हम लोगन तो ईसी तरहा आपन झोपड़िया से जीव जनावर भगात हैं ” उस समय मुझे बकरी बाई का झुर्रियों से आच्छादित , दन्तविहीन और बिखरे बालों वाला चेहरा दुनिया का सबसे खूबसूरत चेहरा नजर आ रहा था ।

       मैने कुछ लोग को लगातार छत निहारने को कहा और कमरे के अन्दर खूब धुआँ किया । कुछ ही मिनटों मे मे सांप जी छत से कूद कर सरपट भागते हुए पता नही कहाँ गायब हो गए । घनी राहत जी राहत !!

    वो जो कहावत है कि – जो काम तलवार नही कर सकती वो एक सूई कर सकती है – पर उसके लिए हमे सूई के महत्व को अच्छे से मानना होगा ।

एक उंगली और तीन उंगली के इशारे ( पार्ट 2 ) Gestures: One Finger, Three Fingers (Part 2)

DrawingPadApp (13)दीपक का  चार घन्टे का बस का सफर पूरा हुआ । बस अपने फाइनल स्टाप पर रुकी ।  सभी यात्री उतरे और बस खाली हो गई । दीपक ने भी अपने सामान के साथ उतर कर एक रिक्शा किया  और घर की ओर चल दिया ।  पर ये क्या ? ये तो बदबू भी रिक्शे पर सवार होकर साथ चल दी । अब तो बदबू ने सड़ान्ध का रूप ले लिया था । दीपक को फिर से क्रोध आने लगा – जरूर से इस रिक्शे वाले ने कल रात बहुत ऊटपटांग खाना खाया होगा और आज बगैर पेट साफ किये रिक्शा लेकर आ गया । उफ् ये तो मेरी नाक पर बदबू के गोले के गोले छोड़ता जा रहा है । और देखो तो मेरी नाक सड़ा कर मस्ती से गाना भी गा रहा है ।
दीपक ने निश्चय कर लिया कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके वो ऐसा रिक्शा डिजाइन करेगा जिसमे रिक्शाचालक और सवारी के बीच एकपरदा हो ताकि रिक्शेवाला कुछ भी खाये पिये ,उसका परिणाम सवारी बिलकुल भी ना भुगते । उफ् ये बदबू तो बिलकुल भी सही नही जा रही ।
दीपक का घर आ गया । दीपक ने पैसे देकर और अपना सामान उतार कर जल्दी से रिक्शेवाले से पीछा छुड़ाया , और राहत की सांस लेकर अपने घर मे प्रवेश किया । माँ ने खुश होकर दीपक का स्वागत किया , और एक गिलास ठन्डा पानी पीने को दिया । दीपक ने पंखा खोल कर सोफे पर अपना आसन जमाया और ठन्डी ठन्डी सांस लेकर अपनी थकान मिटाने का प्रयास किया । पर ये क्या घर मे भी बदबू ? नही नही पूरा घर रोज अच्छे से साफ किया जाता है । घर के सभी सदस्य रोज नहाते भी हैं । ये मेरे मन का भ्रम है । इतनी देर से बदबू का ख्याल ही मन मे समाया हुआ था । उसके सिवाय कुछ दूसरी बात मन मे नही आ रही थी , शायद उसी का साइकोलोजिकल असर है ।
तभी दीपक को याद आया कि बहन ने कच्चे आम अचार के लिये दिये हैं । उसने माँ से कहा कि आम झोले से तुरन्त निकाल ले वरना आम गरमीके मारे पक जायेगे और अचार के लायक नही रहेंगे । माँ ने एक बड़े से बरतन मे झोला उलट दिया । ये क्या ?? कच्चे आमों के बीच एक छोटी सी सड़ी मछली चिपकी थी । अच्छा तो ये थी बदबू का कारण !इस छोटी सी मछली ने दीपक का चार घन्टे का सफर पहाड़ जैसा बड़ा कर दिया था । दीपक को यह सोच कर भी बड़ा खराब लगने लगा कि उसने उन भोले मासूम ग्रामीण किसान , मजदूर के लिये क्या क्या नही सोचा । और वो रिक्शा चालक जिसकी ‘ करतूत ‘ की कल्पना करके दीपक ने रिक्शे का डिजाइन ही बदलने का संकल्प कर लिया था ।
दीपक ने मन ही मन  अपने उन अनजान सहयात्रियों से माफी मांगी क्योंकि उसके कच्चे आमों से भरे झोले मे छिपी मछली के कारण उन्हे भी तो परेशानी हुई होगी , पर उन लोग ने तो कुछ भी शिकायत नही की । वे मजे से दीपक के साथ बैठे रहे । मजदूर और रिक्शाचालक ने तो गाना भी गाया ।
दीपक को लगा कि इस सारे प्रकरण मे जब भी उसकी एक उंगली दूसरों की ओर इशारा  करने को उठी उसी समय उसकी तीन उंगलियों ने उसकी ओर इशारा किया पर उसके अहं ने इस इशारे को समझने नही दिया ।

हल्की

एक उंगली और तीन उंगली के इशारे ( पार्ट १ ) Gestures: One Finger, Three Fingers (Part 1)

OnefingerThreefingers

दीपक देश के नामी गिरामी इंजीनियरिंग कालेज के छात्र थे । काॅलेज के नाम से ही दीपक के व्यक्तित्व की गारिमा बढ़ी हुई थी । स्वयं दीपक का मस्तक गर्व से ऊँचा था । तेजस्वी दीपक की उपलब्धियों से उसका पूरा परिवार भी समाज मे बहुत इज्जत पा रहा था ।
उन दिनो दीपक की बड़ी बहन के डाक्टर पति की पोस्टिंग एक गांव मे थी । माँ ने दीपक को चिट्ठी लिख कर सुझाव दिया कि परीक्षा होने के बाद वो बहन के घर होता हुआ आये । माँ के कहे अनुसार दीपक  परीक्षा समाप्त होते ही बहन के घर चल पड़ा । गाँव बहुत ही मनोरम था । इतनी शान्ति , हरियाली और ताजगी भरा वातावरण शहर वालों को कहाँ नसीब !
कुछ दिन खुशी खुशी गाँव मे अपने बहन व जीजा के साथ बिताने के पश्चात दीपक ने घर जाने की इच्छा जतायी । बहन ने भी प्यार मे भर कर गाँव की खेती की उपज जैसे चना , तरह तरह की दाले ,शुद्ध गुड़ , नारियल , सत्तू , घी आदि दीपक को बांध कर दी साथ ही एक झोले मे कच्चे आम भी अचार बनाने के लिये भर कर दिये ।
दीपक भाई बस मे सवार होकर वापस घर की ओर चल दिये । पूरे चार घन्टे का बस का सफर था । दीपक ने अपना पूरा सामान बस की सीट के नीचे  जमा कर रख दिया । बस चल दी । थोड़ी देर बाद दीपक ने ध्यान दिया कि उसकी नाक दुर्गन्ध से परेशान हो रही है । दीपक को अपने बाजू मे बैठे ग्रामीण व्यक्ति पर शक हुआ । हो ना हो यही बदबू मार रहा है । उफ् ये गाँव वाले भी ना ! पता नही ये साफ क्यों नही रहते ? दीपक ने सारे गाँव वालों के खिलाफ सोचना शुरू कर दिया । तभी बस एक स्टाप पर रुकी और वो गाँव वाला सहयात्री अपना सामान लेकर उतर गया । दीपक ने राहत की सांस ली । तभी बाजू की खाली सीट पर एक मजदूर सा लगता यात्री आकर बैठ गया ।
बस फिर से चल दी । पर बदबू तो वहीं की वहीं , जाने का नाम ही नही ले रही थी । दीपक ने मजदूर को ध्यान से देखा । मजदूर के कपड़े बेहद गन्दे थे । दीपक को फिर से क्रोध आने लगा । अच्छा तो ये भी नही नहाता है ! आखिर इस वर्ग को इस तरह गन्दा रहना क्यों पसन्द है ? देखो तो मेरी नाक सड़ा कर खुद मजे से गाना गा रहा है । पर ये भी तो सच है कि खुद की बदबू खुद को नही आती । वो तो दूसरों के लिये उपहार स्वरू़प होती है । दीपक को किसी तरह भी समझ मे नही आ रहा था कि वो इस कठिन ‘ परिस्थिति’ का सामना कैसे करे ।
इस विकट परिस्थिति ने  आगेे क्या मोड़ लिया ये जानेगे अगली बार ।
हल्की

प्यारा नन्दोई ( पार्ट ३ ) Lovely Brother-in-Law, Part 3

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दरवाजे पर दस्तक सुन कर जब दीपा ने दरवाजा खोला तो अपने नन्दोई को सपरिवार खड़ा देख उसका मुँह बन गया । सुन्दर ने एक हाथ मे टीन का छोटा बक्सा जिसमे बड़ा सा ताला लगा था और दूसरे हाथ मे मुरगा छाप अगरबत्ती के विज्ञापन को दर्शाता बड़ा सा जीन का थैला था। विमला की गोद मे चार साल की पूजा थी ।
“अरे बिना सूचना दिये …?” दीपा ने जबरदस्ती होठों पर मुस्कान लाने की कोशिश की ।
” वो क्या है कि भाभी जी  ! विमला की पी एच डी की थीसिस जमा हो गई है । हमने कहा कि चलो थोड़ा बड़े भाई के घर छुट्टी का मजा ले । और फिर राजकिशोर भाई बड़े अफसर हो गये हैं तो हम लोग भी उनके बड़े बंगले का मजा ले आयें ” खींसे निपोरता हुआ सुन्दर बोला ।
” बड़ा अच्छा किया आपने , आपका ही तो घर है ” दीपा ने पूजा को गोद लेते हुए कहा ।
सुन्दर ने नहा धोकर अपनी बनियान और पट्टेदार जांघिया जब तार पर सूखने डाली तो दीपा का दिल बैठ गया , उसे डर लगा कि ये दृश्य पड़ोसी ना देख ले कि इतने बड़े अफसर के रिश्तेदार का ये ‘ स्टेन्डर्ड ‘ !
शाम को जब सारा परिवार लाॅन मे बैठा चाय पी रहा था तो दूर पहाड़िया से सुन्दर आता दिखा । दीपा को बड़ा अचरज ! सुन्दर के हाथ मे एक मग भी था । पूछने पर कुछ सुन्दर ने झेंपते हुए कहा ” वो क्या है कि भाभी जी कि इंगलिश स्टाइल  के उपर देसी स्टाइल से बैठने से गिरने का डर बना रहता है , और पेट भी सही से साफ नही होता । इसलिये जरा पास के जंगल चला गया था ” यह सुन कर दीपा को बेहोशी सी छा गई ।
दीपा ने कुक से इंगलिश खाना बनवाया और डाइनिंग टेबल पर आकर्षक टेबल मैट पर बोन चाइना का डिनर सेट लगवाया , कांटे चम्मच छूरी आदि सब सजवा दिये । सब खाने बैठे तो दीपा और राजकिशोर खटा खट कांटे छूरी का इस्तेमाल करते खाना खाने लगे पर सुन्दर ने कोशिश की तो खाना कभी उछल जाता , कभी गिर जाता , कभी कांटा किसी दूसरे के प्लेट पर गिर कर हाहाकार मचा देता । विमला की स्थिति ठीक थी क्योंकि पूजा को हाथ से खिलाने के चक्कर मे वो अपने भी निवाले निगले जा रही थी ।
इस तरह का स्टाइलिश ढंग का खाना जब बार बार खाया जाने लगा तो परेशान सुन्दर ने तुरन्त ही अपने किसी दूसरे रिश्तेदार के घर जाने का मन बना  लिया और दूसरे दिन परिवार लेकर चल भी दिया ।
उसके बाद सुन्दर कभी दीपा के घर नही आया । विमला कालेज मे पढ़ाने लगी और उसने पूजा को बहुत अच्छा पढ़ाया फलस्वरूप आज पूजा एक सफल डाक्टर है । और आज सुन्दर को भीअपनी बीबी और बेटी दोनो पर बड़ा ही नाज है ।
हल्की

प्यारा नन्दोई ( पार्ट 2) Lovely Brother-in-law, Part 2

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वापस घर पहुँच कर सुन्दर को जब ये अहसास हुआ कि गैस वाले मामले मे वो जबरदस्त बेवकूफ बन चुका है तो उसे अपने ससुराल वालों पर बहुत क्रोध आया । उसने विमला को खूब खरीखोटी सुनाई । पर विमला ने तो सब कुछ सहते हुए चुप रहने की अच्छी खासी प्रेक्टिस कर रखी थी ।
खैर समय बीता , एक दिन विमला ने सुन्दर को घर पर एक नये नन्हे सदस्य के आगमन की खुशखबरी दी तो सुन्दर ने विमला को फिर से ससुराल छोड़ कर आने की योजना बना डाली । वो विमला को उसके मायके ले गया और बोला कि उन लोग के घर पहली डिलीवरी मायके मे ही होती है , औौर सारा खर्च भी लड़की वाले ही करते हैं । समय से बहुत पहले ही सुन्दर ने विमला को उसके माँ बाप के घर छोड़ कर राहत की सांस ली ।
समय आने पर विमला ने एक नन्ही सी बच्ची को जन्म दिया । वैसे तो इतनी प्यारी सी बच्ची को देख कर सभी बहुत हर्षित हुए पर कन्या ??वो भी सुन्दर जैसे इन्सान के घर ! पता नही वो कैसा व्यवहार करे ।और जिसका डर था वही हुआ । बेटी होने की खबर सुन कर सुन्दर ने बिलकुल ही चुप्पी साध ली । महिनो बीत गये वो बच्ची को देखने नही आया । अब तो विमला के माँ बाप यही समझने लगे कि दामाद ने अपनी पत्नी और बेटी को छोड़ ही दिया है । उन लोग ने इसे अपना दुर्भाग्य समझ चुप लगाना उचित समझा ।
पर चपला बहू दीपा ने अभी हार नही मानी थी , उसने एक योजना बनाई और ससुर जी से कह कर सुन्दर को एक पत्र लिखवाया कि कन्या का नामकरण संस्कार मे पिता का उपस्थिति बहुत जरूरी है अतः आप आ जाइये । सुन्दर जी ससुराल पहुँच गये । कन्या का नाम पूजा रखा गया । हफ्ते भर के बाद जब सुन्दर अकेले ही वापस लौटने की योजना बनाने लगा तो दीपा ने उसके आगे रेल यात्रा के दो रिजर्वेशन टिकट रख दिये । तो सुन्दर जो पहले से ही सोच  कर आया था  ,उसके अनुसार बोला ” देखो जी यहाँ स्कूल बहुत अच्छा है , अगर पूजा यहाँ आप लोग के पास रह कर पढ़ेगी तो अच्छा रहेगा ।” दीपा इस तरह के प्रश्न का उत्तर पहले से तैयार करके बैठी थी , वो तपाक से बोली ” देखिये सुन्दर जी ! यहाँ के स्कूल मे सिर्फ संस्थान मे काम करने वालों के बच्चे ही दाखिला पातें है ” इस पर सुन्दर ने कुटिल राय दी कि राजकिशोर को पूजा का गार्जियन बना दो । अब दीपा ने अपनी सारी बुद्धि लगा कर जवाब दिया ” वो हो सकता है पर दो स्थिति मे , एक तो ये कि पूजा की माँ तलाकशुदा है या फिर उसका पति नही है । दोनो स्थिति मे सरकारी प्रमाणपत्र देना होगा ”
अब तो सुन्दर को कुछ बोलने को नही रहा । उसने चुपचाप पत्नी और बेटी को साथ लिया और ट्रेन पकड़ ली ।अपमान और दुःख से भरी विमला ने आगे क्या किया हम जानेगे अगली बार ।
हल्की

प्यारा नन्दोई ( पार्ट १ ) Lovely Brother-in-law, Part 1

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नवल किशोर जी ने लग लग कर अपने बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा दी । बेटा सफलता पूर्वक इंजीनियर बन कर सरकारी अफसर बन गया । बेटी पोस्ट ग्रेजुएट हो गई । अब पिता के रूप मे उनका अगला फर्ज बनता था, अपने दोनो बच्चों की शादी करना । पढ़ाकू बच्चे  भी पूरी तरह से अपने पिता पर निर्भर थे कि पिताजी उनके लिये एक अच्छा सा जीवन साथी तलाश देंगे । पिता भी खोज मे लग गये । रिश्तेदारों और दोस्तों को बोला , समाचार पत्रों मे विज्ञापन दिया । बेटे राजकिशोर के लिये लड़की तो फटाफट मिल गई । धूमधाम से शादी करके बड़े घर की चपल कन्या को यानी दीपा को घर ले आये । चलो इतना बड़ा काम हुआ । चैन की सांस !
पर बेटी विमला के लिये उपयुक्त वर की तलाश मे अच्छे खासे पापड़ बेलने पड़े । विमला वैसे तो सर्व गुण सम्पन्न ,पढ़ी लिखी लड़की थी पर उसके दो जबरदस्त ‘ माइनस पाइन्ट ‘ थे जो एक अच्छी  अरेन्जड मेरिज के लिये बड़े घातक साबित हो रहे थे । पहला कि विमला देखने मे सुन्दर नही थी दूसरा कि नवल किशोर जी के पास ज्यादा दहेज देने लायक धन नही था । विमला ने पिता की परेशानी समझ कर उनको कहा कि वो शादी नही करेगी , पर पिता नही माने । अन्ततः विमला की शादी एक ऐसे लड़के से कर दी गई जो ज्यादा पढ़ा लिखा ना था और और छोटा – मोटा धन्धा करता था । उ सके चरित्र की बहुत सी विशेषताओं मे मुख्य थी कि वो बहुत लालची , बेशर्म और खड़ूस किस्म का था । ऐसे अलग तरह के व्यक्तित्व के मालिक का नाम था – सुन्दर ।
सुन्दर को विमला बिलकुल पसन्द नही थी । वो उसे तरह तरह से तंग करता था । सहनशील विमला अपनी स्थिति समझती थी अतः चुप रहती थी । घर मे सुन्दर ने कुछ भी सुविधा नही जुटा रखी थी, यहाँ तक की घर मे गैस भी नही थी । विमला को लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाना होता था ।
एक दिन सुन्दर को ख्याल आया कि विमला को अगर पी एच डी करा दी जाय तो काॅलेज मे लेक्चरर बन जायेगी और अच्छी खासी नियमित आय होने लग जायेगी । पर कौन कराये और कहाँ से ? अचानक ख्याल आया कि विमला का भाई इतना बड़ा अफसर लगा हुआ है , वो किस दिन काम आयेगा ? आखिर मै भी तो उस घर का दामाद हूँ ! इस बात का मुझे पूरा फायदा लेना चाहिये ।बस तो फिर सुन्दर विमला को लेकर पहली गाड़ी पकड़ कर अपनी ससुराल पहुँच गया । जैसे ही ससुराल वालों ने ये सुना कि दामाद जी विमला को पी एच डी कराना चाहते हैं , वो भी यहाँ से , तो उनको इसमे सुन्दर की चाल नजर आने लगी । वो ये कि , विमला को ये पीएच डी के बहाने से यहीं छोड़ना चाहता है।
ससुराल वाले तरह तरह के बहाने बनाने लगे । सुन्दर को लगा कि ये तो नही मान रहे हैं तो उसने खाना बनाने वाली गैस की मांग रख दी । ससुराल वाले हैरान कि कहाँ पीएचडी और कहाँ गैस ! बहू दीपा को समझ मे आ गया कि प्यारे नन्दोई को पता नही है कि गैस ऐसे नही मिलती है , कनेक्शन के लिये आवेदन करना होता है । दीपा ने इस अज्ञान का फायदा लेकर तुरन्त घर का गैस स्टोव पैक करके दे दिया । सुन्दर उसी दिन शाम की गाड़ी से गैस स्टोव और विमला को लेकर खुशी खुशी अपने घर वापस चला गया । ससुराल वालों ने चैन की सांस ली ।
अब आगे क्या हुआ ! जानेगे अगली बार ।
हल्की

 दोस्ती और दुश्मनी Friends and foes

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नवल कुमार और हरजीत मे इतनी पक्की पक्की दोस्ती थी कि लोग उनकी दोस्ती की मिसाल देते थे । नवल और हरजीत तो बचपन के मित्र थे ही पर उनके बीबी बच्चे भी आपस मे मित्रता निभा रहे थे । इन दोनो ने अपनी दोस्ती को एक नया रंग दे डाला था , यानी स्वयं अपने अलग से नाम रखे थे । वे एक दूसरे को प्यारा और न्यारा के नाम से पुकारते थे । हरजीत न्यारा और नवल प्यारा बने हुए थे ।
मजे मे दिन बीत रहे थे , परिवार वाले भी खुश । ऐसे ही एक खुश नुमा शाम को न्यारा की छत पर यारों की महफिल जमी थी । किसी बात को लेकर गर्मागर्म बहस छिड़ी हुई थी । किसी एक विषय पर प्यारा और न्यारा मे थोड़ा मतभेद हुआ , फिर दोनो एक दूसरे को गलत ठहराने लगे , उसके बाद दोनो एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लगे , गाली गलौज होने लगी और फिर हाथापाई शुरू हो गई । मित्रों ने उन दोनो को अलग किया । न्यारा और प्यारा दोनो को अपने जिगरी दोस्त से ये उमीद नही थी । दोनो ही एक जैसी गुस्से और अपमान की तकलीफ झेलने लगे ।
न्यारा और प्यारा ने अपने परिवार वालों को दोस्त ( जो अब दुश्मन बन गया था ) के परिवार से अलग हो जाने की हिदायत दे डाली । सबसे पहले एक दूसरे के घर का सामान लौटाया गया जो कभी उधार मांगा गया था जैसे दाल सब्जी की कटोरियाँ , स्वेटर बुनने की सलाइयां , किताबें , साइकिल मे हवा भरने वाला पम्प  आदि । उसके बाद घर की महिलांओ की बातचीत बन्द हुई फिर बच्चों ने भी साथ खेलना बन्द कर दिया । जिस रास्ते से न्यारा जाये ,,प्यारा उस रास्ते को छोड़ दूसरे रास्ते को पकड़ ले । दोनो ने एक दूसरे के साथ बिलकुल अनजानो की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया । पहले तो दोनो को ऐसा करना बड़ा ही अजीब और तकलीफ देह लगा पर धीरे धीरे दोनो को ही इसकी आदत पड़ गई ।
समय तो मन्थर गति से बीतता चलता है और बीता वक्त कभी वापस नही आता । न्यारा और प्यारा को इस तरह अलग हुए लगभग पाँच साल होने को आए । एक दिन बाजार मे न्यारा जी घड़ीसाज से अपनी घड़ी सुधरवा रहे थे और बगल मे ही प्यारा जी मोची से जूता सुधरवाते खड़े थे । पहले तो न्यारा  ने प्यारा को वहाँ देख बुरा सा मुहँ बना लिया , फिर वो पाँच साल पहले के झगड़े को याद करने की कोशिश करने लगा । पर लाख कोशिशों के बाद भी उसे याद ना आया कि लड़ाई किस वजह से हुई थी । उसने प्यारा को चोर निगाह से देखा तो उसे भी अपनी ओर ही देखते पाया । न्यारा से रहा ना गया और बोल पड़ा ” ओए प्यारे तुझे याद है क्या , कि अपनी बोलचाल किस वजह से बन्द हुई थी ? ”
प्यारा तो जैसे इन्तजार ही कर रहा था कि न्यारा कुछ बोले ,वो झट बोल पड़ा ” ना ना मुझे तो जरा भी याद नही ”
अब भरी भरी सी आवाज मे न्यारा बोला ” तो हम किस बात की दुश्मनी निभा रहे हैं ?”
अब तो    दोनो दौड़ कर एक दूसरे के गले लग गए और आँसू बहाने लगे । खुशी और पश्ताचाप दोनो एक साथ ।
खुशी तो समझ मे आती है पर पश्ताचाप क्यों ? अपने बहुमूल्य जीवन के पूरे पाँच साल दुश्मनी , घृणा , गुस्से की भेंट चढ़ा देने के कारण ।
हल्की