”’इनकी कार उसका फ्लैट’-पार्ट-३


सरे आम इतनी गालियाँ खाने के बाद धीरज कुमार का कार चलाने का आत्मविश्वास डोल गया ।अत: ये तय किया कि कार चलाने के लिए एक ड्राइवर रख लिया जाय । उन्होने अपने पीए गोडबोले को एक ड्राइवर का इन्तजाम करने को कहा ।दूसरे दिन ही बेल बजी । दरवाजा खोलने पर अजीब सी वेशभूषा मे एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को हंसते हुए खड़े पाया ।उसने पीली पेन्ट हरी कमीज और हरी टोपी लगा रखी थी ।

” नमस्ते सर , मै टुन्नाकुमार ,मुझे गोडबोले ने भेजा है ” अपने पूरे दाँत दिखाता हुआ टुन्ना बोला ।

” अच्छा तो तुम ही हमारी कार चलाओगे ? ” शान्ति देवी प्रकट होकर बोली ।

” नमस्ते आन्टी जी ” ( शान्ति देवी को टुन्ने का इस तरह उनको आन्टी बुलाना बिलकुल पसन्द नही आया अत: नमस्ते का जवाब ना देकर उन्होने ” ठीक है , ठीक है ” बोल कर अपना पद ऊँचा किया ।

” बधाई हो आप लोग को कि आपने मेरे जैसा इतना अच्छा ड्राइवर चुना है । बहुत कम लोग ही इस नगीने को पहचान पातें हैं “टुन्ना ने किसी फिल्म के डायलॉग की तरह स्टाइल मार कर ये बात कही ।

“अच्छा ,अच्छा आज तो हम लोग व्यस्त हैं , तुम कल आ जाओ कल हमे कहीं जाना है ” कहकर धीरज कुमार ने बात समाप्त की ।

दूसरे दिन शाम को ठीक पाँच बजे दरवाजे की बेल बजी । टुन्ना हाजिर । आज वो काली कमीज और पीली पेन्ट पहिन कर आया था । दोनो पति-पत्नी कार मे पीछे बैठे और टुन्ना कुमार कार चलाने लगे । कार तो अच्छी चला रहा था पर बातें बहुत कर रहा था ” आपकी कार तो बहुत अच्छी है , इन्जन भी बहुत सही है , कितने मे ली ?” टुन्ना ने अचानक प्रश्न किया ।

” पूरे पैंसठ हजार की आई है । असल मे एकदम नई है ” शान्ति देवी बोल उठीं

” अरे पैंसठ हजार ? ठीक इतने मे ही तो मेरा फ्लैट आया है । कार और फ्लैट एक ही दाम के ! ”

कार मे बैठे बैठे ही शान्ति देवी ने पति को उनके इस नादानी भरे खर्चे पर घूर कर देखा । उनको ऐसा करते टुन्ना ने कार के शीशे से देखा और कुटिलता से मुस्कुराया । धीरज कुमार मौन रहे । तभी एक महिला अपनी कार चलाते हुए उनकी कार को ओवर टेक करके आगे चली गई । टुन्ना बोल पड़ा ” देखा सरजी वो मेडम कितनी अच्छी कार चला रही है । वो उम्र मे आपसे कम से कम दस साल बड़ी होगी फिर भी कितनी बढ़िया ड्राइविंग है उसकी । अरे गाड़ी को क्लच और गीयर से कंट्रोल करना चाहिए ना कि हार्न और ब्रेक से ।”

धीरज कुमार को गुस्सा आने लगा ,उनको मन किया कि पीछे से उसकी टोपी उतारें उसकी टकली चन्दिया पर एक चटाक से दें मारें और बोले ” तू मेरे को नसीहत मत दे और चुपचाप गाड़ी चला ” पर धीरज कुमार ने अपने गुस्से को दबा लिया ।

खैर एक घन्टे की ड्राइव के बाद वे लोग वापस आए , गाड़ी गैरज मे रख टुन्ना ने शान्ति देवी को चाभी दी । चाभी लेते समय वे अपना कौतुहल ना रोक पाई और बोल पड़ी ” आप तो एकदम अलग तरह के कपड़े पहनते हैं !”

” हाँ कल जो मैने पहिना था तो मेरी बीबी मुझको ‘उल्टी सरसों’ कहकर चिढ़ा रही थी । आज मुझे वो ‘ टेक्सी- टेक्सी’ कह रही है । मुझे तो सबसे अलग दिखने मे मजा आता है ।मै चाहता हूँ कि आते जाते लोग मुझे मुड़ कर जरूर देखे , खासतौर पर लड़कियाँ !” ऐसा कह कर उसने धीरज कुमार की पीठ पर एक याराना सा धौल जमा दिया और उन्हे आँख मार कर हंसने लगा । उसकी इस हरकत पर धीरज कुमार का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुँच गया । इसकी इतनी हिम्मत भी कैसे हुई ? कहाँ ये जोकर सा आदमी और कहाँ मै ! कान्फ्रेन्स रूम मे सारे अफसरान् मेरा भाषण सांस रोक कर सुनते हैं , मेरी इतनी इज्जत करतें हैं । और ये ? मेरी पीठ पर धौल जमा रहा है ??

धीरज कुमार ने घूरती नजरों से टुन्ना को देखा फिर धीरे से शान्ति को देखा , जिनकी आँखें इस समय इस ‘ घूरने’ को घूर रही थी। धीरज कुमार ने अब चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि जरा सी भी प्रतिक्रिया देने का मतलब है कि मुझे वो पचास हजार याद दिलाए जाते ।

दूसरे दिन ही धीरज कुमार ने पीए गोडबोले को फोन किया कि टुन्ना कुमार को ही क्यों चुना गया , तो गोडबोले ने जवाब दिया ” सर वो मेडम बोली थी कि ड्राइवर ऐसा हो जो कार अच्छी चलाए , साथ ही सारे रास्ते भी सही से जानता हो क्योंकि साहब को रास्ते बिलकुल याद नही रहते और वे बार बार लोगों से रास्ता पूछते रहतें हैं तो मेडम को अच्छा नही लगता ”

फोर रख कर धीरज कुमार ने लम्बी लम्बी सांस ली और अपने पिताजी की फोटो के आगे जाकर बोले ” हे पिताजी ! शान्ति के बाबूजी ने आपको पचास हजार देकर अपनी बेटी का कन्यादान भले ही किया हो पर आपने उनसे पचास हजार लेकर मेरा बलिदान किया है “

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