इनकी कार उसका फ्लैट ! पार्ट-१


धीरज कुमार जी अपनी नई चमचमाती प्रीमियर पद्मिनी फियेट कार को बड़ी प्रसन्नता के साथ चला रहे थे । उनका बरसों का सपना कि उनकी खुद की कार हो ,आज पूरा जो हुआ था ।उनके बगल मे ही उनकी पत्नी शान्ति देवी भी मगन होकर कार सवारी का मजा ले रही थीं ।

जिस सड़क पर कार चल रही थी , वहाँ ज्यादा ट्रेफिक नही था । सिर्फ इक्का दुक्का रिक्शे , स्कूटर सवार और साइकिल सवार ही आ जा रहे थे ।अचानक ही स्पीड ब्रेकर पर धीरज कुमार की कार का सन्तुलन कुछ बिगड़ा और आगे जा रहे एक साइकिल सवार को धीरे से धक्का लग ही गया ।धक्का लगते ही साइकिल की गति तुरन्त ही तेज हो गई , साइकिल का सन्तुलन बिगड़ गया और साइकिल सवार साइकिल समेत सड़क पर गिर गया ।

धीरज कुमार ने भी घबरा कर कार रोक दी और कार से बाहर निकल आये ।अब तक साइकिल वाला भी उठ कर खड़ा हो चुका था ।

” चोट तो नही लगी ?” धीरज कुमार ने बड़े ही प्यार से पूछा ।

” अरे चोट लगे तुम्हारे सारे खानदान को , आज मुझे कुछ हो जाता तो तुम्हारे बाप का क्या जाना था ?” वो व्यक्ति लगभग चिल्लाते हुए बोला ।

धीरज कुमार सकते मे आ गए , वे इस तरह की तू-तड़ाक वाली भाषा सुनने के बिलकुल भी आदी नही थे । आखिरकार वे एक बड़े सरकारी संस्थान के सम्मानित अफसर जो थे । पर ये बात वो साइकिल सवार तो नही जानता था । लगा तरह तरह की गालियाँ देने । पहले उसने कुछ व्यक्तिगत गालियाँ दी , फिर सामाजिक गालियाँ दी , फिर कोसा-कासी शुरू कर दी । भीड़ जमा हो गई । किसी ने भी उस साइकिल वाले व्यक्ति को गाली देने से नही रोका । लगता था कि सब उसकी गालियों की नवीनता पर आश्चर्य चकित थे । निश्चय ही उसको गालियाँ देने मे बड़ी महारत हासिल थी ।

धीरज कुमार घबरा गए । तभी भीड़ मे से एक ने ताना कसा ” अरे साहब जी रोड पर गाड़ी चलाने से पहले किसी ड्राइविंग स्कूल मे दाखिला लेकर अच्छे से गाड़ी चलाना सीख लेना था । रोड पर तो अच्छी ड्राइविंग काम आती है , साहबी नही ”

धीरज कुमार ने कनखियों से उस ताना कसने वाले को देखा, वो उनके ही आधीनस्थ एक कर्मचारी था जिसे उसकी किसी गलती पर पिछले महिने खुद उन्होने ही उसे निलम्बित किया था । उसकी बात सुन कर धीरज कुमार को बहुत ही बुरा लगा । उनकी समझ मे नही आ रहा था कि क्या करें और क्या ना करें ।उन्होने अपने जेब से पर्स निकाला और सौ रूपये का नोट निकाल कर साइकिल सवार ( जिसको जरा भी चोट नही आई थी ) को देना चाहा । पर उसने नोट लेने से इन्कार करते हुए फिर से एक चुभती हुई बात कही -” अरे मुझे क्या देते हो ये कागज का नोट ? जाओ जाकर मन्दिर मे इसे किसी देवता के आगे चढ़ा देना , जिसकी कृपा से आज मै बच गया ।अगर आज मुझे कुछ हो जाता तो मुझ गरीब के बच्चों की तुमको ऐसी हाय लगती कि तुम्हारी सात पुश्ते याद रखतीं ” 

ऐसा कह कर वो बड़बड़ाता हुआ साइकिल लेकर चलता बना । धीरज कुमार हर तरह से अपमानित होकर पिटापिटाया सा चेहरा लेकर वापस कार मे आकर बैठ कर अपना पसीना पोंछने लगे ।

” बहुत धीरे धीरे ध्यान से कार चलाते हुए वापस घर चलो । नही जाना मुझको बाजार । नही करनी मुझको शापिंग वापिंग ”

अब तक कार मे चुप बैठी शान्ति देवी ने डांटती हुई आवाज मे बोली । ‘ बस अब इनकी सुनना और बाकी रह गया था ‘ ऐसा सोचते हुए आहत मन से धीरज कुमार ने कार स्टार्ट की ।

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