इनकी कार उसका फ्लैट ! पार्ट-२


घर पहुँचते ही, सोफे पर अपना बैग फेंक कर शान्ति देवी तो बस फट पड़ी -” मैने कहा था ना कि कार मत खरीदो , मत खरीदो । स्कूटर से अच्छा खासा काम चल रहा था , पर नही जी ! जनाब पर तो कार खरीदने का अच्छा खासा पागलपन सवार था । अब सरे आम अपनी और मेरी बेज्जती करवा कर पड़ गई दिल पर ठन्डक ? कल दफ्तर के सारे लोगों को पता चल जाएगा कि साहब सरे आम गन्दी गन्दी गालियाँ खाकर आयें हैं , मार खाना बस बाकी था । मोहल्ले की सारी औरतों को भी पता चल जाएगा । हाय मै तो अब किसी को मुँह दिखाने के काबिल ना रही ” ऐसा बोलते बोलते शान्ति देवी लगभग हाँफने सी लगी । धीरज कुमार अपना सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गए । उनके कार खरीदने के एक फैसले से जीवन मे एक भूचाल सा आ गया था ।

 अपनी पत्नी शान्ति देवी से धीरज कुमार की जरा भी नही पटती थी । दोनो में पूरे छत्तीस का आंकड़ा था ।कोई भी दिन ऐसा ना जाता कि दोनो की आपस मे बहसबाजी ना हो ,पर लोकलज्जा के खातिर दोनो का साथ रहना भी जरूरी था ।इन दोनो के सम्बन्धों की कड़ुवाहट शादी के पहले से चली आ रही थी । मामला कुछ इस तरह शुरू हुआ – धीरज कुमार के पिता एक दुकान पर मुनीम का काम करते थे । उनके तीन बेटी और एक बेटा था , परिवार का खर्चा बहुत मुश्किल से चलता था ।धीरज पढ़ने मे बहुत अच्छे थे । इंजीनियरिंग कॉलेज मे टॉप करते थे , वजीफा मिलता था । भविष्य उज्जवल था ।

 धीरज के पिता बनवारी लाल की बड़ी दो बेटियाँ शादी लायक थी पर घर मे दहेज देने लायक पैसा नही था । अब पैसा आए कहाँ से ? बनवारी लाल ने अपने दोस्त रामप्रसाद , जिनकी मिठाई की दुकान थी ,से पूरे पचास हजार उधार मांगे । रामप्रसाद की नजर मेधावी धीरज पर थी । वे उसे अपना दामाद बनाना चाहते थे । उन्होने झट अपनी बेटी शान्ति के लिए धीरज को मांग लिया । शान्ति उस समय आठवीं कक्षा मे पढ़ती थी । तय ये हुआ कि रिश्ता पक्का अभी कर लेते हैं , शादी छ: सात साल बाद होगी , तब तक दोनो की पढ़ाई पूरी हो चुकेगी और धीरज भी नौकरी करने लगेगें । बनवारीलाल तुरन्त राजी हो गए क्योंकि ऐसी स्थिति मे वे उधार चुकाने से छूट रहे थे ।

 आठवीं की छात्रा शान्ति को खाने पीने का बहुत ही ज्यादा शौक था । पिता हलवाई ,तो मजा ही मजा ! रोज वो रबड़ी मलाई मे जलेबी डाल कर खाती , सुबह समोसे कलाकन्द उदरस्थ करती , बरफी गुलाबजामुन तो चलते फिरते खाती ही रहती , और माँ का बनाया देशी घी मे बना तीनो समय का खाना भी चटकारें लेकर खाती । नतीजा सामने था । शर्त के मुताबिक कुछ साल बाद जब शान्ति देवी दुल्हन बन कर ससुराल गईं तो अच्छी खासी लम्बी चौड़ी देह की स्वामिनी बन चुकी थी पर दुल्हा उनके आगे नाटा और दुबला सा !अब क्या हो ? शादी तो होनी ही थी सो हुई ।

ऐसा नही है कि दोनो मे ना पटने का सिर्फ एक यही कारण था । कोई भी बात युद्ध का रूप ले लेती थी ।आपस मे इतना लड़ने झगड़ने वाले पति-पत्नी रूपी दो वीर योद्धाओं के तीन बच्चे कैसे हो गए , इस बात पर विद्वान लोग घन्टों बहस कर सकतें हैं ।

लड़ाई कुछ ऐसे शुरू होती थी जैसे एक बार कवि सम्मेलन के रसिया धीरज कुमार बोले ” देखो आज रात मै कवि सम्मेलन जाउँगा , रात लौटने मे देर हो जाएगी ”

” कवि सम्मेलन क्यों ? मै क्या घर मे अकेले बोर होती रहूँगी ? चलो पिक्चर चलतें हैं ” शान्ति देवी बोली ।

” पिक्चर ? मुझे पिक्चर जाना बिलकुल पसन्द नही ” धीरज कुमार

” अरे पिक्चर नही जाने का तो बहाना है ,असल मे तुमको मेरे साथ कहीं जाना पसन्द नही है । ये बात तो तुम लोग को तब सोचनी चाहिए थी , जब तुम्हारे पिताजी मेरे बाबूजी से पचास हजार रूपये ले रहे थे ।भगवान मेरे बाबूजी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे जिनके खून पसीने की कमाई से तुम्हारे घर की दो दो लड़कियाँ निपट गई ” ऐसा कह कर शान्ति देवी ने ऊपर की ओर मुँह करके अपनी आँखें बन्द करके अपने दोनो हाथ जोड़ दिए ।

बात को कहाँ से कहाँ मोड़ देती है ये महिला ! और मोड़ कर हमेशा मुझे वो पचास हजार के लेन देन को जरूर याद दिला कर नीचा दिखा देती है । धीरज कुमार को क्रोध आ गया । वे गुस्से मे अपने दोनो हाथ रगड़ते हुए अपने दिवंगत पिताजी की दीवार पर लटकी फोटो को देखने लगे । उनको लगता था कि उनके पिताजी की वजह से उनकी जिन्दगी एक मजाक सा बन कर रह गई है ।

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