डारविन का सिद्धान्त

                 मै जब भी कमरे की खिड़की का परदा सरकाती तो घर के पीछे एक छोटे से , सूखे से रेतीले टीले पर लगे पीपल के पेड़ को जरूर निहारती । इस पीपल के पेड़ मे कुछ तो बात अवश्य थी , आसपास की और वनस्पति के मुकाबले यह पेड़ कुछ अलग ही छटा लिये हुए था । अपनी घनी और चमकदार हरी पत्तियों से आच्छादित यह वृक्ष बरबस ही मुझे मोह लेता था । संध्या के समय जब अनेक पक्षी अपने रैन-बसेरे के लिए वृक्ष की शाखाओं पर शरण लेने आते तो वह दृश्य भी देखने लायक होता ।

    यहीं पास मे ही बंगले का आउट हाउस भी था , जिसमे एक पंक्ति मे चार घरों मे चार परिवार रहते थे । सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि एक दिन उनके नल मे पानी आना बन्द हो गया ! प्लम्बर आया , उसको कुछ समझ नही आया । वाटर सप्लाई विभाग के अन्य लोग भी बुलाये गए पर कोई भी इस बन्द लाइन फिर से चालू ना कर सका । अब क्या हो ? पानी तो मनुष्य जीवन की आक्सीजन जितनी ही बड़ी आवश्यकता है । सभी लोगों ने हमारे घर के बगीचे वाले नल से पानी भरना शुरू कर दिया । उन लोगों को तो परेशानी हो रही थी पर साथ ही हम लोग की परेशानी भी कम नही थी । पानी की सप्लाई सुबह शाम सिर्फ एक एक घन्टा ही होती थी । बगीचे का नल लगातार खुला रहने के कारण हमारे घर मे पानी का प्रेशर कम से कम हो रहा था , जिसके कारण ओवरहेड टैंक मे पानी नही भर पाता था । पर हम यही सोच कर रह जाते थे कि हमारी परेशानी फिर भी कुछ कम ही थी ।

      कुछ महिने ऐसे ही चला , क्योंकि इसके अलावा और कोई चारा ही न था । पर एक दिन यह जान कर घोर आश्चर्य हुआ कि सामने वाले बड़े बंगले के बड़े साहब के आउट हाउस मे भी पानी आना बन्द हो गया ! उस बंगले मे वरमा जी का परिवार रहता था । बड़े साहब वरमा जी की पत्नी अपने आप मे निराली थी -रोबीले थानेदार और हायर सेकेन्डरी स्कूल की खड़ूस प्रधानाध्यापिका का मिलाजुला रूप थी । क्या वरमा जी , क्या उनके मातहत , क्या भृत्यवर्ग सभी उनसे डरते थे । उनके पढ़ाई मे अव्वल आते बच्चे -” जी ममा ! अच्छा ममा ! हांजी ममा ! के अलावा मुँह से और कोई ध्वनी नही निकालते थे ।

   अपने बेडरूम मे लगी बेल का बटन जब एक बार मिसेज वरमा दबाती थी थीं तो आउट हाउस मे ये सिग्नल जाता था कि खानसामा को बंगले मे हाजिर होना है , दो बार की बेल – माली दौड़ो , तीन बार – बरतनवाली , चार बार – सफाई वाली , पाँच बार – माली फिर से दौड़ो क्योंकि कुत्ता घुमाना है । लगातार बेल बजी जा रही – सारे एक साथ दौड़ो क्योंकि साहब की कार को धक्का देना है ।

     बेल सुन कर बंगले की ओर दौड़ लगाने वाले ये सभी लोगों ने अब वरमाजी के बगीचे से पानी लेना शुरू कर दिया । परिणाम स्वरूप मिसेज वरमा का बाथरूम का शावर मे पानी आना बन्द ! इस कारण से उनका गुस्सा सांतवे आसमान पर । ( कभी कभी इन कड़क स्वभाव वाले लोगों से एकदम सही काम भी हो जातें है ) यहाँ फोन – वहाँ फोन , इसको डांट उसको डांट । तुरन्त ही दस पन्द्ह लोगो का दल अपने सुपरवाइजर के साथ हाजिर हो गया । पानी ना आने का कारण पता लगाने के लिए उन लोग ने पाइप लाइन वाली जगहों की खुदाई करनी शुरू कर दी । खुदाई करते करते वे लोग टीले तक चले गए और वहाँ घोर आश्चर्य भरा कारण नजर आया !! वो ये कि पाइप लाइन मे पीपल की जड़े प्रवेश कर गई थीं और लाइन ब्लाक हो गई थी । सबसे मजेदार बात तो ये थी कि जिस पाइप की चूड़ी खोलने के लिए श्रमिकों को अपने औजारों की सहायता से इतना जोर लगाना पड़ रहा था , वहीं कोमल कोमल जड़ों का समूह चूड़ियों के रास्ते आराम से प्रवेश करके अपने पेड़ की वाटर-सप्लाई मे लगा हुआ था ।

    मुझे उस लुभावने पीपल की खूबसूरती का राज समझ मे आ गया । डारविन के सिद्धान्त के अनुसार हर जीव मे जीवन के प्रति एक जिजीविषा ( survival instinct) होती है इसके लिए वो संघर्ष करता है (struggle for the life ) और अन्त मे ताकतवर विजयी होता है ( survival of the fittest ) और हमारा चहेता वो टीले वाला पीपल का पेड़ भी इसका अपवाद ना था क्योंकि जब उसको अपनी जमीन मे जल ना मिला तो उसने हमारी पाइप लाइन मे सेन्ध मार कर अपने को बचाए और बनाए रखते हुए डारविन के सिद्धान्त का ही पालन किया ।

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