उलझी ऊन सुलझी बुनाई


उलझी ऊन सुलझी बुनाई
  मिसेज तेजवती के जैसा स्वेटर की बुनाई करने वाला तो मुझे आजतक नही दिखा । वे बुनाई भी करती जातीं और बात भी करती जातीं । वे स्वेटर बुनाई के साथ साथ मेगजीन वगैरह भी पढ़लेती थी । बुनाई की स्पीड तो इतनी तेज थी कि अभी देखो तो सलाई पर फन्दे डाल रही हैं और अभी देखो तो बार्डर तैयार , अगले दिन पल्ला तैयार , अगले हफ्ते ही इलाके का कोई ना कोई बच्चा वो स्वेटर पहिने खेलता नजर आ जाता था । इस तरह तेजवती जी सीजन मे काफी कमाई कर लेती थी । हालाकि उनकी बुनाई लोगो को बहुत महंगी पड़ती थी फिर भी जबरदस्त ‘ क्वालिटी ‘ के कारण लोग उनसे स्वेटर बनवाना पसन्द करते थे ।

      गरमी की छुट्टियों मे तेजवती जी अपने बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाती थी । उनका मायका जिस शहर मे था वहाँ ऊन बनाने की फेक्टरियाँ लगी हुई थी । तेजवती वहाँ से सस्ते मे ऊन की लच्छियाँ खरीद कर ले आती थी । फिर उन लच्छियों के गोले बना कर रख लेती थी । लोंगो की डिमांड के अनुसार स्वेटर बना कर बेच देती थी, और काफी पैसे कमा लेती थी । इस बार उनका दोहरा फायदा हुआ । फेक्टरी वाले ने ढ़ेर सारी उलझी हुई रंग बिरंगी ऊन उनको मुफ्त मे दे दी । तेजवती सारी ऊन खुशी से ले आई ।

        तेजवती ने पहले तो उलझी ऊन को सुलझा कर गोले बनाने की कोशिश की पर बार बार ऊन तोड़ कर फिर से जोड़नी पड़ रही थी । थक हार कर उन्होने गोले बनाने का इरादा ही छोड़ दिया । अचानक उनको एक आइडिया आया और उन्होने ऊन का एक लम्बा सा धागा खीचा और बुनाई शुरु कर दी । और इसी तरह धागे खीचा तोड़ कर बुन दिया फिर से नया धागा खीचा ,तोड़ा और बुना ।

     जब वे इस तरह की बुनाई कर रही थी तो बड़ा मजेदार दृश्य दिख रहा था । एक ओर ऊन का बेहद उलझा हुआ फालतू सा ढ़ेर और उसी से तैयार होता रंग बिरंगा स्वेटर ! मैने उनसे ऊन के गोले ना बना पाने का कारण पूछा तो बोली कि ” ऊन इतनी ज्यादा उलझी है कि सुलझाने बैठे तो वही करते रह जायेगें और स्वेटर बनाने का जरूरी काम पीछे छूट जायेगा । या हो सकता है कि ना ही ऊन सुलझे ना ही गोले बने और ना ही स्वेटर ! तो हमने सोचा कि मुख्य काम तो स्वेटर बनाना है वही करना चाहिये । ”

      मैने उनकी समझदार समझ की दाद दी तो वे मुस्कुराते हुए बोली ” इसी तरह हमारी जिन्दगी भी इस उलझे हुए ऊन की तरह है अगर हम हर चीज को सुलझाने मे ही लगे रहे तो सब कुछ तो सुलझने से रहा और हमारा बेहद कीमती वक्त भी निकल जायेगा । अतः हमे चाहिये अपने स्वयं मे परिवर्तन लाकर खुद की जिन्दगी को इस बनते हुए स्वेटर की तरह बनायें । खूबसूरत जिन्दगीनुमा स्वेटर मे गुंथती ‘ ऊन ‘ अपने आप सुन्दर रूप ले लेगी ।”

       हल्की

लुटेरा बंदर


लुटेरा बंदर

अपना नया नया रंगीन चश्मा यानी सनग्लास लगा कर पम्मी ने आदमकद शीशे के आगे अपने को निहारा तो वह अपने को निहारते ही रह गई , पूरा व्यक्तित्व ही बदला नजर आया , काले चश्मे को पहनने से उसके चेहरे की चमक और गोरापन दोनो और बढ़े से लग रहे थे । यह देख कर पम्मी का दिल बल्लियों उछलने लगा । अब इतनी ज्यादा खुशी के और भी कई कारण थे । जबसे पम्मी ने अपनी पसंदीदा हिरोइन को एक फोटो मे ऐसा ही चश्मा लगाए देखा था तभी से उसने वैसा ही चश्मा खरीद लेने की मन मे ठान ली थी पर ये ‘ ब्रान्डेड चश्मा ‘ बहुत ही अधिक महंगा था , और एकदम से इसे खरीद लेना पम्मी के बस की बात नही थी । “अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात ही उसे तुमसे मिलाने मे जुट जाती है ” बस तो फिर पम्मी रोज उस चश्मे का फोटो देख कर रोज ही ‘ ओम् शान्ति ओम् ‘ के इस डायलॉग को मन ही मन दोहराने लगी । साथ ही उसने कुछ महिने तक बचत की और जिस महिने किटी पार्टी मे उसे किटी के पैसे मिले तो दोनो को मिलाकर तुरन्त ही वो ब्रान्डेड ग्लासेज ले ने शो रूम चल पड़ी । चश्मा आ गया ! अपार खुशी ! पर एक बात जो बहुत महत्वपूर्ण थी कि , सभी सहेलियों के बीच इसका प्रदर्शन ! उसके लिए तो अगली किटी पार्टी मे जाना जरूरी था , पर इस पार्टी के लिए पूरे एक माह इन्तजार करना था , यानी कुछ धीरज रखना जरूरी था ।

 इसी बीच पम्मी के यहाँ कुछ रिश्तेदार आए और उन सबका वृन्दावन जाने का बन गया । वृन्दावन पम्मी के घर से ,चालीस किलोमीटर की दूरी पर था । टेक्सी से जाना तय हुआ । पम्मी खुशी खुशी नया चश्मा लगा कर उन लोग के साथ टेक्सी मे सवार होकर चल पड़ी । टेक्सी जब वृन्दावन मे मन्दिर परिसर के आगे रूकी । वहीं आगे दीवार पर बड़े बड़े अक्षरों मे लिखा था – चेतावनी : कृपया अपना मोबाइल ,पर्स चश्मा आदि बंदरों से बचा कर रखें – धन्यवाद । पम्मी इस चेतावनी पर ध्यान नही दे पाई क्योंकि पम्मी का मोबाइल बजने लगा , वो टेक्सी से उतर कर बड़े स्टाइल से मोबाइल पर बात करने लगी । तभी अचानक एक बन्दर बड़ी ही कुशलता से पम्मी का प्यारा चश्मा ले उड़ा ! मोबाइल पर बात करना छोड़ पम्मी बंदर के पीछे भागी । लेकिन तब तक बंदर सामने की ऊँची दीवार पर चढ़ गया । पम्मी आँखों मे आँसू भर कर बंदर से अपना चश्मा वापस करने की विनती करने लगी । पर बंदर तो काला चश्मा लगा कर अपनी दुनिया रंगीन करने मे लगा हुआ था ।

  तभी पता नही कहाँ से एक फ्रूटी बेचने वाला घटनास्थल पर प्रकट हो गया और कहने लगा ” बंदर को फ्रूटी पसन्द होती है आप उसे फ्रूटी दिखाओ , तो वो चश्मा वापस कर देगा ” बंदर का चश्मा लूटना और तुरन्त ही फ्रूटी बेचने वाले का आना -दोनो की ‘ टाइमिंग ‘ मे इतना सामजस्य था कि किसी को भी शक हो सकता था कि बंदर और फ्रूटी बेचने वाले मे कोई ‘ बिजनेस डील ‘ अवश्य हुई होगी । खैर पम्मी के हैरान परेशान पति हरकत मे आए और एक नही दो दो ( दो इसलिए कि तब तक बंदर का बच्चा भी आ गया था ) फ्रूटी खरीद कर दीवार के पास जाकर ” आ आ ये ले ले वो दे दे ” बोल बोल कर बंदर को ‘ एक्सचेंज अॉफर ‘ का लालच देने लगे । पर बंदर कहाँ मानने वाला ? पहले उसने चश्मा खुद पहना फिर बच्चे को पहनाया । बच्चे को चश्मा बहुत ढीला लगा उसने सिर हिला कर चश्मे को नकार दिया । तो बंदर ने चश्मा दो तीन टुकड़ों मे तोड़ कर दीवार के दूसरी ओर फेंक दिया । इधर किसी दूसरे बंदर ने झपट्टा मार कर पति महाशय के हाथ से फ्रूटी भी छीन ली । अपने प्यारे चश्मे का ये दुर्गति होते देख पम्मी के मुँह से एक चीख निकल गई । तभी उन लोग का ध्यान दीवार पर लिखी ‘ चेतावनी ‘ पर गया । उसे पढ़ कर क्रोध मे भरकर पम्मी लगभग चिल्लाने लगी ” अरे इस चेतावनी मे मोबाइल भी लिखा था । अरे नासपीटे हरामखोर बंदर ! ले जाना था तो मेरा मोबाइल ले जाता । मोबाइल वैसे भी पुराना हो गया था । तू मेरा चश्मा ले गया और उसे भी मेरे आगे तोड़ कर फेंक दिया । तेरा कभी भला नही होगा ! हाय अब मै किटी पार्टी मे सहेलियों को क्या दिखाउँगी ! हाय मेरा इतना मंहगा चश्मा ! उफ् !

इनकी कार उसका फ्लैट ! पार्ट-१


धीरज कुमार जी अपनी नई चमचमाती प्रीमियर पद्मिनी फियेट कार को बड़ी प्रसन्नता के साथ चला रहे थे । उनका बरसों का सपना कि उनकी खुद की कार हो ,आज पूरा जो हुआ था ।उनके बगल मे ही उनकी पत्नी शान्ति देवी भी मगन होकर कार सवारी का मजा ले रही थीं ।

जिस सड़क पर कार चल रही थी , वहाँ ज्यादा ट्रेफिक नही था । सिर्फ इक्का दुक्का रिक्शे , स्कूटर सवार और साइकिल सवार ही आ जा रहे थे ।अचानक ही स्पीड ब्रेकर पर धीरज कुमार की कार का सन्तुलन कुछ बिगड़ा और आगे जा रहे एक साइकिल सवार को धीरे से धक्का लग ही गया ।धक्का लगते ही साइकिल की गति तुरन्त ही तेज हो गई , साइकिल का सन्तुलन बिगड़ गया और साइकिल सवार साइकिल समेत सड़क पर गिर गया ।

धीरज कुमार ने भी घबरा कर कार रोक दी और कार से बाहर निकल आये ।अब तक साइकिल वाला भी उठ कर खड़ा हो चुका था ।

” चोट तो नही लगी ?” धीरज कुमार ने बड़े ही प्यार से पूछा ।

” अरे चोट लगे तुम्हारे सारे खानदान को , आज मुझे कुछ हो जाता तो तुम्हारे बाप का क्या जाना था ?” वो व्यक्ति लगभग चिल्लाते हुए बोला ।

धीरज कुमार सकते मे आ गए , वे इस तरह की तू-तड़ाक वाली भाषा सुनने के बिलकुल भी आदी नही थे । आखिरकार वे एक बड़े सरकारी संस्थान के सम्मानित अफसर जो थे । पर ये बात वो साइकिल सवार तो नही जानता था । लगा तरह तरह की गालियाँ देने । पहले उसने कुछ व्यक्तिगत गालियाँ दी , फिर सामाजिक गालियाँ दी , फिर कोसा-कासी शुरू कर दी । भीड़ जमा हो गई । किसी ने भी उस साइकिल वाले व्यक्ति को गाली देने से नही रोका । लगता था कि सब उसकी गालियों की नवीनता पर आश्चर्य चकित थे । निश्चय ही उसको गालियाँ देने मे बड़ी महारत हासिल थी ।

धीरज कुमार घबरा गए । तभी भीड़ मे से एक ने ताना कसा ” अरे साहब जी रोड पर गाड़ी चलाने से पहले किसी ड्राइविंग स्कूल मे दाखिला लेकर अच्छे से गाड़ी चलाना सीख लेना था । रोड पर तो अच्छी ड्राइविंग काम आती है , साहबी नही ”

धीरज कुमार ने कनखियों से उस ताना कसने वाले को देखा, वो उनके ही आधीनस्थ एक कर्मचारी था जिसे उसकी किसी गलती पर पिछले महिने खुद उन्होने ही उसे निलम्बित किया था । उसकी बात सुन कर धीरज कुमार को बहुत ही बुरा लगा । उनकी समझ मे नही आ रहा था कि क्या करें और क्या ना करें ।उन्होने अपने जेब से पर्स निकाला और सौ रूपये का नोट निकाल कर साइकिल सवार ( जिसको जरा भी चोट नही आई थी ) को देना चाहा । पर उसने नोट लेने से इन्कार करते हुए फिर से एक चुभती हुई बात कही -” अरे मुझे क्या देते हो ये कागज का नोट ? जाओ जाकर मन्दिर मे इसे किसी देवता के आगे चढ़ा देना , जिसकी कृपा से आज मै बच गया ।अगर आज मुझे कुछ हो जाता तो मुझ गरीब के बच्चों की तुमको ऐसी हाय लगती कि तुम्हारी सात पुश्ते याद रखतीं ” 

ऐसा कह कर वो बड़बड़ाता हुआ साइकिल लेकर चलता बना । धीरज कुमार हर तरह से अपमानित होकर पिटापिटाया सा चेहरा लेकर वापस कार मे आकर बैठ कर अपना पसीना पोंछने लगे ।

” बहुत धीरे धीरे ध्यान से कार चलाते हुए वापस घर चलो । नही जाना मुझको बाजार । नही करनी मुझको शापिंग वापिंग ”

अब तक कार मे चुप बैठी शान्ति देवी ने डांटती हुई आवाज मे बोली । ‘ बस अब इनकी सुनना और बाकी रह गया था ‘ ऐसा सोचते हुए आहत मन से धीरज कुमार ने कार स्टार्ट की ।

इनकी कार उसका फ्लैट ! पार्ट-२


घर पहुँचते ही, सोफे पर अपना बैग फेंक कर शान्ति देवी तो बस फट पड़ी -” मैने कहा था ना कि कार मत खरीदो , मत खरीदो । स्कूटर से अच्छा खासा काम चल रहा था , पर नही जी ! जनाब पर तो कार खरीदने का अच्छा खासा पागलपन सवार था । अब सरे आम अपनी और मेरी बेज्जती करवा कर पड़ गई दिल पर ठन्डक ? कल दफ्तर के सारे लोगों को पता चल जाएगा कि साहब सरे आम गन्दी गन्दी गालियाँ खाकर आयें हैं , मार खाना बस बाकी था । मोहल्ले की सारी औरतों को भी पता चल जाएगा । हाय मै तो अब किसी को मुँह दिखाने के काबिल ना रही ” ऐसा बोलते बोलते शान्ति देवी लगभग हाँफने सी लगी । धीरज कुमार अपना सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गए । उनके कार खरीदने के एक फैसले से जीवन मे एक भूचाल सा आ गया था ।

 अपनी पत्नी शान्ति देवी से धीरज कुमार की जरा भी नही पटती थी । दोनो में पूरे छत्तीस का आंकड़ा था ।कोई भी दिन ऐसा ना जाता कि दोनो की आपस मे बहसबाजी ना हो ,पर लोकलज्जा के खातिर दोनो का साथ रहना भी जरूरी था ।इन दोनो के सम्बन्धों की कड़ुवाहट शादी के पहले से चली आ रही थी । मामला कुछ इस तरह शुरू हुआ – धीरज कुमार के पिता एक दुकान पर मुनीम का काम करते थे । उनके तीन बेटी और एक बेटा था , परिवार का खर्चा बहुत मुश्किल से चलता था ।धीरज पढ़ने मे बहुत अच्छे थे । इंजीनियरिंग कॉलेज मे टॉप करते थे , वजीफा मिलता था । भविष्य उज्जवल था ।

 धीरज के पिता बनवारी लाल की बड़ी दो बेटियाँ शादी लायक थी पर घर मे दहेज देने लायक पैसा नही था । अब पैसा आए कहाँ से ? बनवारी लाल ने अपने दोस्त रामप्रसाद , जिनकी मिठाई की दुकान थी ,से पूरे पचास हजार उधार मांगे । रामप्रसाद की नजर मेधावी धीरज पर थी । वे उसे अपना दामाद बनाना चाहते थे । उन्होने झट अपनी बेटी शान्ति के लिए धीरज को मांग लिया । शान्ति उस समय आठवीं कक्षा मे पढ़ती थी । तय ये हुआ कि रिश्ता पक्का अभी कर लेते हैं , शादी छ: सात साल बाद होगी , तब तक दोनो की पढ़ाई पूरी हो चुकेगी और धीरज भी नौकरी करने लगेगें । बनवारीलाल तुरन्त राजी हो गए क्योंकि ऐसी स्थिति मे वे उधार चुकाने से छूट रहे थे ।

 आठवीं की छात्रा शान्ति को खाने पीने का बहुत ही ज्यादा शौक था । पिता हलवाई ,तो मजा ही मजा ! रोज वो रबड़ी मलाई मे जलेबी डाल कर खाती , सुबह समोसे कलाकन्द उदरस्थ करती , बरफी गुलाबजामुन तो चलते फिरते खाती ही रहती , और माँ का बनाया देशी घी मे बना तीनो समय का खाना भी चटकारें लेकर खाती । नतीजा सामने था । शर्त के मुताबिक कुछ साल बाद जब शान्ति देवी दुल्हन बन कर ससुराल गईं तो अच्छी खासी लम्बी चौड़ी देह की स्वामिनी बन चुकी थी पर दुल्हा उनके आगे नाटा और दुबला सा !अब क्या हो ? शादी तो होनी ही थी सो हुई ।

ऐसा नही है कि दोनो मे ना पटने का सिर्फ एक यही कारण था । कोई भी बात युद्ध का रूप ले लेती थी ।आपस मे इतना लड़ने झगड़ने वाले पति-पत्नी रूपी दो वीर योद्धाओं के तीन बच्चे कैसे हो गए , इस बात पर विद्वान लोग घन्टों बहस कर सकतें हैं ।

लड़ाई कुछ ऐसे शुरू होती थी जैसे एक बार कवि सम्मेलन के रसिया धीरज कुमार बोले ” देखो आज रात मै कवि सम्मेलन जाउँगा , रात लौटने मे देर हो जाएगी ”

” कवि सम्मेलन क्यों ? मै क्या घर मे अकेले बोर होती रहूँगी ? चलो पिक्चर चलतें हैं ” शान्ति देवी बोली ।

” पिक्चर ? मुझे पिक्चर जाना बिलकुल पसन्द नही ” धीरज कुमार

” अरे पिक्चर नही जाने का तो बहाना है ,असल मे तुमको मेरे साथ कहीं जाना पसन्द नही है । ये बात तो तुम लोग को तब सोचनी चाहिए थी , जब तुम्हारे पिताजी मेरे बाबूजी से पचास हजार रूपये ले रहे थे ।भगवान मेरे बाबूजी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे जिनके खून पसीने की कमाई से तुम्हारे घर की दो दो लड़कियाँ निपट गई ” ऐसा कह कर शान्ति देवी ने ऊपर की ओर मुँह करके अपनी आँखें बन्द करके अपने दोनो हाथ जोड़ दिए ।

बात को कहाँ से कहाँ मोड़ देती है ये महिला ! और मोड़ कर हमेशा मुझे वो पचास हजार के लेन देन को जरूर याद दिला कर नीचा दिखा देती है । धीरज कुमार को क्रोध आ गया । वे गुस्से मे अपने दोनो हाथ रगड़ते हुए अपने दिवंगत पिताजी की दीवार पर लटकी फोटो को देखने लगे । उनको लगता था कि उनके पिताजी की वजह से उनकी जिन्दगी एक मजाक सा बन कर रह गई है ।

”’इनकी कार उसका फ्लैट’-पार्ट-३


सरे आम इतनी गालियाँ खाने के बाद धीरज कुमार का कार चलाने का आत्मविश्वास डोल गया ।अत: ये तय किया कि कार चलाने के लिए एक ड्राइवर रख लिया जाय । उन्होने अपने पीए गोडबोले को एक ड्राइवर का इन्तजाम करने को कहा ।दूसरे दिन ही बेल बजी । दरवाजा खोलने पर अजीब सी वेशभूषा मे एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को हंसते हुए खड़े पाया ।उसने पीली पेन्ट हरी कमीज और हरी टोपी लगा रखी थी ।

” नमस्ते सर , मै टुन्नाकुमार ,मुझे गोडबोले ने भेजा है ” अपने पूरे दाँत दिखाता हुआ टुन्ना बोला ।

” अच्छा तो तुम ही हमारी कार चलाओगे ? ” शान्ति देवी प्रकट होकर बोली ।

” नमस्ते आन्टी जी ” ( शान्ति देवी को टुन्ने का इस तरह उनको आन्टी बुलाना बिलकुल पसन्द नही आया अत: नमस्ते का जवाब ना देकर उन्होने ” ठीक है , ठीक है ” बोल कर अपना पद ऊँचा किया ।

” बधाई हो आप लोग को कि आपने मेरे जैसा इतना अच्छा ड्राइवर चुना है । बहुत कम लोग ही इस नगीने को पहचान पातें हैं “टुन्ना ने किसी फिल्म के डायलॉग की तरह स्टाइल मार कर ये बात कही ।

“अच्छा ,अच्छा आज तो हम लोग व्यस्त हैं , तुम कल आ जाओ कल हमे कहीं जाना है ” कहकर धीरज कुमार ने बात समाप्त की ।

दूसरे दिन शाम को ठीक पाँच बजे दरवाजे की बेल बजी । टुन्ना हाजिर । आज वो काली कमीज और पीली पेन्ट पहिन कर आया था । दोनो पति-पत्नी कार मे पीछे बैठे और टुन्ना कुमार कार चलाने लगे । कार तो अच्छी चला रहा था पर बातें बहुत कर रहा था ” आपकी कार तो बहुत अच्छी है , इन्जन भी बहुत सही है , कितने मे ली ?” टुन्ना ने अचानक प्रश्न किया ।

” पूरे पैंसठ हजार की आई है । असल मे एकदम नई है ” शान्ति देवी बोल उठीं

” अरे पैंसठ हजार ? ठीक इतने मे ही तो मेरा फ्लैट आया है । कार और फ्लैट एक ही दाम के ! ”

कार मे बैठे बैठे ही शान्ति देवी ने पति को उनके इस नादानी भरे खर्चे पर घूर कर देखा । उनको ऐसा करते टुन्ना ने कार के शीशे से देखा और कुटिलता से मुस्कुराया । धीरज कुमार मौन रहे । तभी एक महिला अपनी कार चलाते हुए उनकी कार को ओवर टेक करके आगे चली गई । टुन्ना बोल पड़ा ” देखा सरजी वो मेडम कितनी अच्छी कार चला रही है । वो उम्र मे आपसे कम से कम दस साल बड़ी होगी फिर भी कितनी बढ़िया ड्राइविंग है उसकी । अरे गाड़ी को क्लच और गीयर से कंट्रोल करना चाहिए ना कि हार्न और ब्रेक से ।”

धीरज कुमार को गुस्सा आने लगा ,उनको मन किया कि पीछे से उसकी टोपी उतारें उसकी टकली चन्दिया पर एक चटाक से दें मारें और बोले ” तू मेरे को नसीहत मत दे और चुपचाप गाड़ी चला ” पर धीरज कुमार ने अपने गुस्से को दबा लिया ।

खैर एक घन्टे की ड्राइव के बाद वे लोग वापस आए , गाड़ी गैरज मे रख टुन्ना ने शान्ति देवी को चाभी दी । चाभी लेते समय वे अपना कौतुहल ना रोक पाई और बोल पड़ी ” आप तो एकदम अलग तरह के कपड़े पहनते हैं !”

” हाँ कल जो मैने पहिना था तो मेरी बीबी मुझको ‘उल्टी सरसों’ कहकर चिढ़ा रही थी । आज मुझे वो ‘ टेक्सी- टेक्सी’ कह रही है । मुझे तो सबसे अलग दिखने मे मजा आता है ।मै चाहता हूँ कि आते जाते लोग मुझे मुड़ कर जरूर देखे , खासतौर पर लड़कियाँ !” ऐसा कह कर उसने धीरज कुमार की पीठ पर एक याराना सा धौल जमा दिया और उन्हे आँख मार कर हंसने लगा । उसकी इस हरकत पर धीरज कुमार का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुँच गया । इसकी इतनी हिम्मत भी कैसे हुई ? कहाँ ये जोकर सा आदमी और कहाँ मै ! कान्फ्रेन्स रूम मे सारे अफसरान् मेरा भाषण सांस रोक कर सुनते हैं , मेरी इतनी इज्जत करतें हैं । और ये ? मेरी पीठ पर धौल जमा रहा है ??

धीरज कुमार ने घूरती नजरों से टुन्ना को देखा फिर धीरे से शान्ति को देखा , जिनकी आँखें इस समय इस ‘ घूरने’ को घूर रही थी। धीरज कुमार ने अब चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि जरा सी भी प्रतिक्रिया देने का मतलब है कि मुझे वो पचास हजार याद दिलाए जाते ।

दूसरे दिन ही धीरज कुमार ने पीए गोडबोले को फोन किया कि टुन्ना कुमार को ही क्यों चुना गया , तो गोडबोले ने जवाब दिया ” सर वो मेडम बोली थी कि ड्राइवर ऐसा हो जो कार अच्छी चलाए , साथ ही सारे रास्ते भी सही से जानता हो क्योंकि साहब को रास्ते बिलकुल याद नही रहते और वे बार बार लोगों से रास्ता पूछते रहतें हैं तो मेडम को अच्छा नही लगता ”

फोर रख कर धीरज कुमार ने लम्बी लम्बी सांस ली और अपने पिताजी की फोटो के आगे जाकर बोले ” हे पिताजी ! शान्ति के बाबूजी ने आपको पचास हजार देकर अपनी बेटी का कन्यादान भले ही किया हो पर आपने उनसे पचास हजार लेकर मेरा बलिदान किया है “

 इनकी कार उसका फ्लैट पार्ट -४


धीरज कुमार की प्रीमियर पद्मिनी फियेट कार सड़क पर ज्यादा नही चल पाई क्योंकि धीरज कुमार का अब प्रमोशन हो गया था और फलस्वरूप सरकार की ओर से दफ्तर के कामकाज के लिए ‘ एम्बेसडर कार ‘ मिलने लगी , वो भी ‘ शोफर ड्रिवेन ‘ ! नक्शे बढ़ गए ! पर पति-पत्नी खट् -खट् बदस्तूर जारी रही ।
समय बीतता गया ,और एक दिन ऐसा आया कि जिस दिन धीरज कुमार को नौकरी से रिटायर होना था । ऑफिस की ओर से विदाई पार्टी हो रही थी । संस्थान के गेट के बाहर ही एक अभिनन्दन सभा का आयोजन किया गया था । मंच पर अनेक वक्ता धीरज कुमार साहब की प्रसंशा मे दो शब्द बोल रहे थे । धीरज कुमार ढ़ेर सारी फूलमालाओं से लदे -फदे मंच पर मुख्य अतिथि की कुरसी पर विराजमान थे , और अपनी बड़ाईयाँ सुन सुन कर हौले हौले मुस्करा रहे थे । अचानक उनका ध्यान गया कि श्रोताओं की भीड़ मे टुन्ना कुमार भी उपस्थित है । हमेशा की तरह आज भी वो अपने स्पेशल कपड़ों मे सुसस्जित होकर आया था । उसने लाल रंग की पेन्ट और लाल रंग की कमीज पहनी थी और काली टोपी लगाई थी । ‘ जरूर आज इसकी बीबी ने इसे लेटर -बाक्स की उपाधि दी होगी ‘ ऐसा सोच कर धीरज कुमार मुस्करा दिए ।

  तभी उन्होने देखा कि टुन्ना कुमार फोटोग्राफर से कुछ कह रहा है और फोटोग्राफर अपनी मुन्डी हिला रहा है । और फिर टुन्ना कुमार पुष्प-गुच्छ लेकर स्टेज पर चढ़ आया । धीरज कुमार को पुष्प-गुच्छ देने लगा , उन्होने पुष्प-गुच्छ लेकर अपने पीए को देना चाहा पर टुन्ना कुमार ने पुष्प-गुच्छ पर अपनी पकड़ ढीली नही की और बोला – सर मुस्कुराइये , फोटो खिच रही है ” धीरज कुमार खिन्न मन से जबरदस्ती मुस्कुराए । तीन चार बार मे फोटो क्लिक हुई । इसके बाद टुन्ना कुमार उनको पुष्प- गुच्छ देते हुए बोला ” सर मेरी ओर से आपको शुभकामनाएँ”

” धन्यवाद , टुन्ना कुमार कैसे हो तुम ?” धीरज कुमार ने भी अपनी ओर से औपचारिकता दिखाई ।

” मजे मे हूँ ! आपको बधाई मेरा फ्लैट पैंतीस लाख का हो गया है ” टुन्ना बात करने को अमादा हो गया ।

धीरज कुमार को बुरा लगा कि ये इस बात को अभी क्यों कह रहा है ।

” अभी तो मेरे फ्लैट का दाम और बढ़ेगा क्योंकि शहर का सारा विकास उसी एरिया मे हो रहा है ” फिर टुन्ना उनके कान के पास अपना मुँह ले जाकर कहने लगा ” सर वो मेडम का फोन आया था कि आप की कार बेकार हो गई है और उसको बेचना है । अब इतनी पुरानी कार रखे रखे इतनी खराब हालत मे हो गई है कि उसको तो कोई कबाड़ी ही दस- पाँच हजार मे ले सकता है ”

“ठीक है ,ठीक है कभी घर आना ” कह कर धीरज कुमार ने टुन्ना को स्टेज से नीचे जाने का इशारा किया ।

” सर ये टुन्ना स्पेशल परमीशन लेकर गेट पास बनवा कर आपसे मिलने आया है ” धीरज कुमार के पीए ने धीरे से कहा ।

‘ ये आदमी मेरे से पता नही कौन सी दुश्मनी निभा रहा है कि आज मुझे यही बताने के लिए स्टेज पर चढ़ आया कि उसके फ्लैट की कीमत पैंतीस लाख हो गई है और मेरी कार कबाड़ी को जाएगी । क्या ये मुझको ये जतलाना चाहता है कि आपकी कार और मेरा फ्लैट एक ही दाम मे खरीदे गए थे ,आप घाटे मे रहे और मै फायदे में ! आखिर ये आदमी मेरे से किस बात मे काम्पटीशन लड़ा रहा है ?

‘मेडम का फोन आया था ‘ टुन्ना कुमार की कही बात याद आते ही उनका मन किया कि वे भरी सभा मे अपने सिर के बाल खुद ही नोच लें ।

इनकी कार उसका फ्लैट -५


धीरज कुमार जो पहले ही बहुत कम बोलते थे ,रिटायरमेन्ट के बाद और भी ‘ मौनी बाबा ‘ बन गए । तब तक इन्टरनेट का पदापर्ण हो चुका था और वो धीरज कुमार के लिए बहुत बड़ा मित्र और सहायक सिद्ध हुआ ।

 एक दिन धीरज कुमार ऐसे ही टीवी पर समाचार देख रहे थे , टीवी पर एक समाचार दिखाया जा रहा था कि किसी के घर सीबीआई का छापा पड़ा , संयोगवश वो अधिकारी धीरज कुमार का मुलाकाती निकला । वे उत्तेजनावश चिल्ला उठे ” देखो शान्ति जल्दी आओ , रमाकान्त जी के घर सीबीआई का छापा पड़ा है ”

“अरे कहाँ कहाँ ?” अरे अरे कहती हुई शान्ति देवी किचन से तेजी से दौड़ती हुई चली आईं और कौतुहल से टीवी स्क्रीन पर नजरे गड़ा दी ।

” देखो तो जरा रमाकान्त कैसे मुँह लटकायें है ? और रजनी ( रमाकान्त की पत्नी ) को तो देखो जरा , कैसे रोने रोने को हो रही है , अरे देखो नल्ली की प्योर सिल्क की साड़ी घर पर पहने हुए है । हम तो सूती साड़ी पहनती हैं । ”

तभी टीवी पर अगला सीन दिखाया गया कि सीबीआई वाले रमाकान्त का हाथ पकड़ कर ले जा रहे हैं ।ये देख कर शान्ति देवी फिर से चिल्ला उठीं ” अरे रजनी एक छोटा सा तौलिया तो दे देती अपने पति को । ऐसे मे लोग तौलिये से मुँह छिपा कर जाया जाता है । देखो कैसा नंगा चेहरा लेकर जा रहे हैं बेचारे रमाकान्त जी ! ये रजनी को तो जरा भी बुद्धि नही है ” इतना कह कर वे वापस किचन मे चली गई ।

धीरज कुमार ने टीवी बन्द कर दिया और उठ कर दीवार से अपने दिवंगत पिताजी की फोटो उठाई और उसे ले जाकर पीछे वाली बालकनी मे टांग दिए । बोले ” बस पिताजी आप यहीं रहने लायक हो , पचास हजार दहेज लेकर मेरी जिन्दगी ऐसी तैसी करने की यही सजा मै आपको दे सकता हूँ ” फिर धीरज कुमार गुस्से मे अपनी दोनो हथेलियाँ रगड़ते हुए बड़बड़ाने लगे ” अजीब महिला है ये ! इसको इस बात से कुछ लेना देना नही कि रमाकान्त कैसा आदमी निकला ! ये तो बस नल्ली सिल्क की साड़ी और नंगा चेहरा देख रही है ”

    धीरज कुमार को फिर से नई कार खरीदने का शौक वापस आ गया । वे सारा समय इन्टरनेट पर नए नए माडल की सुन्दर कारें देखने लगे । कार डीलरों को और बैंक वालों को फोन करने लगे । उनको ऐसा करते देख शान्ति देवी का माथा ठनकने लगा ।

एक दिन अचानक फोन की घन्टी बजी ।धीरज कुमार ने फोन उठाया । उधर से आवाज आई ” मै टुन्ना कुमार बोल रिया ”

” कैसे याद किया टुन्ना कुमार ?” धीरज कुमार बुरा सा मुँह बनाते हुए बोले ।

“” ऐसे ही हाल चाल जानने को । इत्ते साल हो गए । मेडम का फोन आया था तो पता लगा कि आप नई कार खरीदने वाले है ? अरे साहब मत खरीदो । एक बार तो आप कार खरीद कर फंस चुके हैं । दुबारा काई कू अपने को खाली पीली मुसीबत मे डालना । मेरा बेटा टेक्सी चलाता है , जब चाहे तब उसको बुलाओ ”

” वो बाद की बात है , तुम बताओ कि तुमने फोन क्यों किया था ? लगभग दाँत पीसते हुए धीरज कुमार बोले ।

” आपको बधाई सर जी ! मेरा फ्लैट अब एक करोड़ रूपये का हो गया है ! ये बताने को सर जी ”

धीरज कुमार ने गुस्से के मारे फोन पटक दिया । गुस्सा इतना कि पास की टेबल पर जोर से एक मुक्का मारा और चिल्ला कर बोले ” घर मे कोई है तो वो कान खोल कर सुन ले ! मै कोई कार वार खरीदने नही जा रहा हूँ “